किसी को फसल के अच्छे दाम की तलाश,किसी को काम की तलाश,किसी को प्यार की तलाश, किसी को शांति की तलाश, किसी को खिलौनों की तलाश,किसी को कहानी की तलाश,किसी को प्रेमिका की तलाश, किसी को प्रेमी की तलाश,................ तलाश ही जीवन है
Friday, May 11, 2012
घी के दिए जलाऐंगे, मंटो का जन्मदिन मनाऐंगे...
Monday, January 17, 2011
मंटो मरा नहीं, जिंदा है हम सबके दिलों में!
एक अजीब हादिसा हुआ है। मंटो मर गया है, गो वह एक अर्से से मर रहा था। कभी सुना कि वह पागलखाने में हैं,कभी सुना कि बहुत ज्यादा शराब पीने के कारण अस्पताल में पड़ा है, कभी सुना कि यार-दोस्तों ने उससे सम्बंध तोड़ लिया है। कभी सुना कि वह और उसके बीबी-बच्चे फ़ाकों गुजर रहे हैं। बहुत-सी बातें सुनीं। हमेशा बुरी बातें सुनीं,लेकिन यकीन न आया, क्योंकि इस अर्से में उसकी कहानियाँ बराबर आती रहीं। अच्छी कहानियाँ भी और बुरी कहानियाँ भी। ऐसी कहानियाँ भी जिन्हें पढ़कर मंटो का मुँह नोचने को जी चाहता था, और ऐसी कहानियाँ भी, जिन्हें पढ़कर उसका मुँह चूमने को भी जी चाहता था। मैं समझता था,जब तक ये खत आते रहेंगे,मंटो खैरियत से है। क्या हुआ अगर वह शराब पी रहा है, क्या शराबखोरी सिर्फ साहित्यकारों तक ही सीमित है? क्या हुआ अगर वह फाके कर रहा है, इस देश की तीन चौथाई आबादी ने हमेशा फाके किये है। क्या हुआ अगर वह पागलखाने चला गया है, इस सनकी और पागल समाज मे मंटो ऐसे होशमंद का पागलखाने जाना कोई अचम्भे की बात नहीं। अचम्भा तो इस बात पर है कि वह आज से बहुत पहले पागलखाने क्यों नहीं चला गया। मुझे इन तमाम बातों से न तो कोई हैरत हुई, न कोई अचम्भा हुआ। मंटो कहानियाँ लिख रहा है, मंटो खैरियत से है, खुदा उसके कलम में और जहर भर दें। मगर आज जब रेडियो पाकिस्तान यह खबर सुनायी कि मंटो दिल की धड़कन बंद होने के कारण चल बसा तो दिल और दिमाग चलते चलते एक लमहे के लिए रूक गए। दूसरे लमहे में यह यकीन न आया। दिल और दिमाग ने विश्वास न किया कि कभी ऐसा हो सकता है। निमिष भर के लिए मंटो का चेहरा मेरी निगाहों में घूम गया। उसका रोशन चोड़ा माथा,वह तीखी व्यंग्य भरी मुस्कराहट, वह शोले की तरह भड़कता हुआ दिल कभी बुझ सकता है? दूसरे क्षण यकीन करना पड़ा।....आज सर्दी बहुत है और आसमान पर हल्की हल्की सी बदली छायी हुई है, मगर इस बदली में बारिश की एक बूंद भी नहीं है। मंटो को रोने—रूलाने से इंतहाई नफरत थी। आज मैं उसकी याद में आंसू बहाकर उसे परेशान नहीं करूंगा। मैं आहिस्ता से अपना कोट पहन लेता हूं और घर से बाहर निकल जाता हूं…घर के बाहर वही बिजली का खम्भा है, जिसके नीचे हम पहली बार मिले थे। यह वही अंडरहिल रोड है,जहां आल इंडिया रेडियो का दफतर था, जहां हम दोनो काम किया करते थे। यह मेडन होटल का बार है,यह मोरी गेट,जहां मंटो रहता था, यह जामा मस्जिद की सीढ़ियां है, जहां हम कबाब खाते थे, यह उर्दू बाजार है। सब कुछ वही है,उसी तरह है। सब जगह उसी तरह से काम हो रहा है। आल इंडिया रेडियो भी खुला है,मेडन होटल का बार भी और उर्दू बाजार भी, क्योंकि मंटो एक बहुत मामूली आदमी था। वह एक गरीब साहित्यकार था। वह मंत्री न था कि कहीं कोई झंडा उसके लिए झुकता.… वह एक सतायी हुई जबान का गरीब और सताया हुआ साहित्यकार था। वह मोचियों,तवायफों और तांगेवालों का साहित्यकार था। ऐसे आदमी के लिए कौन रौयेगा, कौन अपना काम बंद करेगा? इसलिए आल इंडिया रेडियो खुला है,जिसने उसके डरामे सैकड़ो बार ब्राडकास्ट किये है। उर्दू बाजार भी खुला है, जिसने उसकी हजारों किताबें बेची है और आज भी बेच रहा है। आज मैं उन लोगों को भी हंसता देख रहा हूं,जिन्होने मंटो से हजारों रूपयों की शराब पी है। मंटो मर गया तो क्या हुआ, बिजनेस बिजनेस है? क्षण भर को भी काम नहीं रूकना चाहिए। वह जिसने हमें अपनी सारी जिंदगी दे दी, उसे हम अपने समय का एक क्षण भी नहीं दे सकते। सिर झुकाये क्षण भर के लिए उसकी याद को हम अपने दिलों में ताजा नहीं कर सकते। ....हमने मंटो पर मुकदमे चलाये, उसे भूखा मारा,उसे पागलखाने में पहुंचाया, उसे अस्पतालों में सड़ाया और आखिर में उसे यहां तक मजबूर किया कि वह इंसान को नहीं, शराब की एक बोतल को अपना दोस्त समझने पर मजबूर हो गया। यह कोई नयी बात नहीं। हमने गालिब के साथ यही किया था, प्रेमचंद के साथ यही किया था, हसरत के साथ यही किया था और आज मंटो के साथ भी यही सलूक करेंगे, क्योंकि मंटो कोई उनसे बड़ा साहित्यकार नहीं है, जिसके लिए हम अपने पांच हजार साल की संस्कृति की पुरानी परम्परा को तोड़ दें। हम इंसानो के नहीं, मकबरों के पुजारी हैं….
मंटो एक बहुत बड़ी गाली था। उसका कोई दोस्त ऐसा नहीं था,जिसे उसने गाली न दी हो। कोई प्रकाशक ऐसा न था, जिससे उसने लड़ाई मोल न ली हो,कोई मालिक ऐसा न था, जिसकी उसने बेइज्जती न की हो। प्रकट रूप से वह प्रगतिशीलों से खुश नहीं था, न अप्रगतिशीलों से, न पाकिस्तान से,न हिंदुस्तान से, न चचा साम से, न रूस से। जाने उसकी बेचैन और बेकरार आत्मा क्या चाहती थी। उसकी जबान बेहद तल्ख थी। शैली थी तो कसैली और कंटीली,नश्तर की तरह तज और बेरहम,लेकिन आप उसकी गाली को,उसकी कड़ी बातों को,उसके तेज,नोकीले,कंटीले शब्दों को जरा—सा खुरच कर तो देखिए,अंदर से जिंदगी का मीठा—मीठा रस टपकने लगेगा। उसकी नफरत में मुहब्बत थी, नग्नता में आवरण,चरित्रहीन औरतों की दास्तानों में उसके साहित्य की सच्चरित्रता छिपी थी। जिंदगी ने मंटो से इंसाफ नहीं किया,लेकिन तारीख जरूर उससे इंसाफ करेगी। ....शाम के वक्त तांगे से मैं,जोय अंसारी,एडीटर शाहराह के साथ जामा मस्जिद से तीस हजारी अपने घर को आ रहा था। रास्ते में मैं और जोय अंसारी आहिस्ता—आहिस्ता मंटो की शख्सियत और उसके आर्ट पर बहस करते रहे। सड़क पर बहुत गढ़े थे,इसलिए बहस में बहुत—से— नाजुक मुकाम भी आए। एक बार पंजाबी कोचवान ने चौंककर पूछा—क्या कहा जी, मंटो मर गया? जोय अंसारी ने आहिस्ता से कहा, हां भाई! और फिर अपनी बहस शुरू कर दी। कोचवान धीरे—धीरे अपना तांगा चलाता रहा। लेकिन मोरी गेट के पास उसने अपने तांगे को रोक लिया और हमारी तरफ घूमकर बोला— साहब, आप लोग कोई दूसरा तांगा कर लीजिए। मैं आगे नहीं जाउंगा। —उसकी आवाज में एक अजीब—सा दर्द था। इसके पहले कि हम कुछ कह सकते,वह हमारी तरफ देखे बगैर अपने तांगे से उतरा और सीधा सामने की बार में चला गया।
नोट— यह संस्मरण मंटो:मेरा दुश्मन किताब—लेखक अश्क जी,से लिया गया है। इस संस्मरण को कृष्ण चंद जी ने लिखा है। आप मंटो पर लिखी पिछली पोस्टों को भी नीचे दिए लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं।
Monday, May 12, 2008
सआदत हसन मंटो का जन्मदिन और उनकी दो छोटी कहानियाँ
कल यानि 11 मई को एक महान लेखक सआदत हसन मंटो का जन्मदिन था। उनके लेखन में एक सच था अपने समय का। ज़िस सच से मुँह चुराना मुमकिन नही है। उनकी याद में दो छोटी छोटी कहानी दे रहा हूँ। उम्मीद है आप साथियों को पंसद आऐगी।
करामात
लूटा हुआ माल बरामद करने के लिए पुलिस ने छापे मारने शुरू किए। लोग डर के मारे लूटा हुआ माल रात के अंधेरे में बाहर फेंकने लगे, कुछ ऐसे भी थे, जिन्होने अपना माल भी मौका पाकर अपने से अलहदा कर दिया, ताकि क़ानूनी गिरफ़्त से बचे रहें।
एक आदमी को बहुत दिक्कत पेश आई। उसके पास शक्कर की दो बोरियां थी, जो उसने पंसारी की दुकान से लूटी थी। एक तो वह जूं-तूं रात के अंधेरे में पास वाले कुंए में फेंक आया, लेकिन जब दूसरी उसमें डालने लगा, तो खुद भी साथ चला गया।
शोर सुनकर लोग इकटठे हो गए। कुंए में रसिसयाँ डाली गई।
जवान नीचे उतरे और उस आदमी को बाहर निकाल लिया गया।
लेकिन वह चंद धंटो के बाद मर गया। दूसरे दिन जब लोगों ने इस्तेमाल के लिए उस कुंए में से पानी निकाला, तो वह मीठा था।
उसी रात उस आदमी की क़ब्र पर दीए जल रहे थे।
घाटे का सौदा
दो दोस्तों ने मिलकर दस-बीस लडकियों में से एक लड्की चुनी और बयालीस रुपए देकर उसे खरीद लिया।
रात गुजारकर एक दोस्त ने उस लड्की से पूछा " तुम्हारा नाम क्या है?"
लड्की ने अपना नाम बताया, तो वह भिन्ना गया " हमसे तो कहा गया था कि तुम दूसरे मज़हब की हो।"
लड्की ने जवाब दिया " उसने झूठ बोला था।"
यह सुनकर वह दौडा-दौडा अपने दोस्त के पास गया और कहने लगा - "उस हरामजादे ने हमारे साथ धोखा किया हैं हमारे ही मज़हब की लड्की थमा दी। चलो , वापस कर आंए।
नोट- जिन प्रकाशनो ने इनकी किताबें प्रकाशित उन्हें मेरी तरफ से धन्यवाद।