बुढ़ापा
गुम-सुम सा बैठा सोचता वह रहता हैं
हाथ की लकीरों में अतीत को वह देखता रहता हैं
चेहरे की झुर्रीयों में मुस्कान उसकी कहीं छिप जाती हैं
सांसो की धड़कनों में दिल की बात उसकी कहीं रुक जाती हैं
स्कूल जाते बच्चों में अपना चेहरा वह ढूढ़ता हैं
चिडियों की चहचाहटों में मन उसका उछलने को करता हैं
जो मिला खाया पीया पहना, वह करता है
कभी कभी बच्चों सी फरमाईश भी वह करता हैं
उठता हैं चलता हैं रुकता हैं फिर से चलता हैं
कांपते हाथों से चीजें बड़े करीने से वह रखता हैं
जो कभी करता था अपने मन की
आज सपनो को तकिये के नीचे छुपाया वह करता हैं
एक छोटे से कमरे में बैठा अपनो की वह राह तकता हैं
फिर भगवान से भावुक हो कर गिले शिकवे खूब वह करता हैं
जब नींद नही आती उसकी आँखो में
तब रात को उठ-उठ कर बैठा वह करता हैं