वह लड़की एक पहेली थी
कहने को तो इसकी ढ़ेरों सहेली थी
फिर भी यह अकेली थी।
मुस्कराती थी, खिलखिलाती थी, देर तक बतियाती थी
पर ना जाने अकेले में किस सोच में डूब जाती थी।
कभी-कभी वह बच्चों सी बातें करती थी
और कभी वो फ्रायड को भी मात दे जाती थी।
जब कोई बात ना होती थी
तब वह अपने कोमल हाथों से सपने बुनने लगती थी
कभी आसमान को छूने के सपने
कभी सुन्दर, प्यारे घर के सपने
परंतु अपनो के सपने पूरे करने में वह अपने सपने भूल जाती थी।
आज मिली वही रस्तें में बोली "कैसे हो तुम"
मैं पहचान ना सका, बस एकटक देखता रहा
उसके खुरदरे हाथों को
उसकी आँखो के नीचे के काले घेरों को
उसकी हडिडयों की काया को
उसकी आँखों में आये एक आँशू को
मैं बोला "तुम वही हो ना जिसका नाम मैंने "पहेली" रख दिया था"
वो बोली "हाँ वही पहेली, जिदंगी की पहेली सुलझाते सुलझाते सच में ही एक पहेली बन कर रह गई
यह बात कहते ही वह जार जार रो पड़ी, जो कभी बात बात पर हँसती थी।