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Sunday, September 21, 2008

लगता हैं तुम इंसान नहीं।

जिधर देखो इंसान के सपनों का खून हो रहा।

समझ नहीं आता कि क्यों इंसान को इंसान मार रहा। रोज ही ऐसा मंज़र देखने को मिल रहा दुनिया के अलग-अलग कोनों में। कोई मासूम सा बच्चा सवाल कर रहा। हँसती खेलती बच्ची की हँसी गायब हो गई। किसी माँ की आँखे पथरा गई रोते रोते। किसी के बुढ़ापे का सहारा छीन गया। किसी का दोस्त बिछड़ गया। इन्हीं की पुकारों को सुनकर एक तुकबंदी की थी जिसका प्रकाशन "साहित्यशिल्पी" ने किया। आप अवश्य पढ़े । आप नीचे दिये लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं।
एक दर्दनाक मंज़र

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