Thursday, September 12, 2024

मेरी निम्मो

 

कोई-कोई फिल्म प्यार-सी मीठी, प्रेमिका-सी सुंदर और बच्चे-सी मासूम होती है. कुछ ऐसी ही फिल्म है 'मेरी निम्मो'. यूं तो इस फिल्म की कहानी एक छोटे से गांव में जन्मी प्रेम की साधारण-सी कहानी है लेकिन यह साधारणता ही इस फिल्म की खूबसूरती है.

इस सादी कहानी में गांव के एक नाबालिग लड़के 'हेमू' को एक बालिग लड़की 'निम्मो' से 'वैसा' वाला नहीं 'वो' वाला प्यार हो जाता है. फिल्म 'वैसे वाले प्यार' से शुरू होकर 'वो वाले प्यार' तक चलती है. और आखिर में गांव के एक बाहरी मोड़ से होकर एक दूसरे ही मोड़ को मुड़कर खत्म जाती है. बस इतनी-सी कहानी है इस फिल्म की.

परंतु इस फिल्म में 'वैसे' और 'वो' वाले प्यार के बीच जो खट्टा-मीठा घटता है वो दिल को छू लेता है. ऐसा लगता है कि आप मासूमियत की नदी में रुक-रूककर डूबकी लगा रहे हैं. डूबकी से जो आनंद मिल रहा है. वो अद्भूत है.

आपको इस फिल्म में गांव के खाली पड़े खेतों में क्रिकेट खेलने से पहले टॉस के लिए सूखे-गिले का इस्तेमाल करते बच्चे नजर आ जाएंगे. गांव की किसी गली के नुक्कड़ पर बच्चे पिठ्ठू खेलते दिख जाएंगे. गांव की एक सीधी गली में कुत्ते से डरता एक बच्चा मिल जाएगा. गांव के एक बड़े से घर से कोई लड़की लोकगीत 'झटपट डोलिया उठाओ रे कहरवा' गाते हुए मिल जाएगी. गांव में आई शहरी बारात में कोई शहरी 'एक्स्चुसे मी' कहता हुआ भी मिल जाएगा. फिल्म के इस गांव में घूमते हुए आपको कुछ ना कुछ अवश्य मिल जाएगा. जैसे फिल्म देखते वक्त मुझे ये सब मिला.

आखिर में जब आप इस फिल्म को देखकर उठेंगे तो आपकी झोली खाली नहीं होगी. बल्कि अलग-अलग एहसासों से भरी होगी. और ये एहसास ही ‘मेरी निम्मो’ फिल्म की जान हैं.


नोट- फोटो गूगल से लिया गया है. 

Tuesday, March 12, 2024

बचपन का दोस्त और यादें

कभी कोई दोस्त अचानक से वर्षों बाद याद आ जाता है. याद आने के बाद मिलने या बात करने की तलब बेहद ज्यादा हो जाती है. लेकिन आपके पास ना उसका फोन नंबर होता है. और ना ही उसके घर का पता. बस तब आप मायूस होकर उसके साथ बिताए पुराने दिनों को याद करने लग जाते हैं.

खैर यह दोस्ती उन दिनों की है, जब सुबह-सुबह गली में ‘दही ले लो दही’ की आवाज लगाते दही बेचने वाले आया करते थे. उनके सिर पर कपड़े की इंडी जैसी कुछ हुआ करती थी. और उसके ऊपर पतले कपड़े से ढकी दही की हांडी. अब तो याद भी नहीं कि दही कितने रूपए किलो मिला करती थी. लेकिन दही बेहद स्वादिष्ट हुआ करती थी. उसके स्वाद का कारण दही का मिट्टी की हांडी में जमना हुआ करता था.

फिर भरी दोपहरी में ‘कुल्फी वाले’ घंटी बजाते हुए अपनी रेहड़ी लेकर आते थे, उनकी रेहड़ी में कुल्फी के पास एक लोहे की चरखी लगी होती थी. जिसके बीच में अंक लिखे होते थे. बच्चे लोग उसे घूमाते थे. और कोई-कोई बच्चा ऐसे घुमाता था कि दो-दो कुल्फी पा जाता था. और कोई एक आध तीन भी पा जाता था. और मेरे जैसा तो हमेशा बस एक ही कुल्फी पाता था. उसी भरी दोपहरी में गली के नुक्कड़ पर एक ‘भूस की टाल पर ताश’ खेलने वालों का मजमा भी लगा रहता था. वहां अक्सर ताश का गेम 'सीप' खेला जाता था लेकिन कभी-कभी दहला पकड़ भी खेला जाता था. ताश के 'सीप' के खेल में हम भी कभी-कभी हाथ आजमा लिया करते थे.

खैर मैं बात दोस्त की कर रहा था. मुझे इस वक्त उसकी शादी से जुड़ी एक घटना की याद आ रही है. हल्की वाली सर्दियों में दोस्त की शादी थी. कैमरा वाला करना उनके लिए संभव नहीं था. लेकिन शादी की फोटो याद के लिए हो जाएं तो ये भी हम दोनों की इच्छा थी. इसलिए कैमरे की तलाश शुरू हुई कि किसी दोस्त के पास कोई छोटा-मोटा कैमरा हो तो उसे शादी में ले जाया जाए. खैर हमारे एक किराएदार थे. वे एक बैंक में काम करते थे. और वे उत्तराखंड के थे. उनके पास कैमरा था. वो भी रील वाला. तब रील वाले कैमरे ही हुआ करते थे ज्यादातर. लेकिन वे कैमरामैन नहीं बनना चाहते थे. तब आपां दोस्त के लिए कैमरामैन बन गए थे.  बात बस इतनी-सी नहीं है. जो बात मैं बताना चाहता हूं वो दूसरी है.

खैर फिर क्या था शादी के दिन नए कपड़े पहनकर आपां कैमरामैन हो गए. बारात लुटियंस दिल्ली में किसी एमपी के घर के पीछे बने घरों में जानी थी. कैमरे की रील सीमित मात्रा में खरीदी गई थीं. तो फोटो भी हमारे द्वारा भी कम लिए जा रहे थे. शायद तीन-चार रील ही खरीदी गई थीं. और उस वक्त एक रील में 32-36 के करीब फोटो आती थीं. लेकिन जब फेरे के समय की बारी आई तो रील कम पड़ गईं. जहां तक मुझे याद है बस एक रील ही बची थी. तब मैंने यह बात दोस्त को बताई और कहा कि अब मैं क्या करूं? अब तो रील भी खरीदी नहीं जा सकती. क्योंकि उन दिनों उस लुटियंस इलाके में कोई दुकान भी नहीं थी. तब उसने कहा था, जो तुझे करना है वो तू कर ले. और फिर फेरों के वक्त जिसे देखो वही कहे कि मेरी फोटो ले लो दूल्हे के साथ. मैं फोटो लेने से मना कर दूं या अनदेखा कर दूं तो लोग गुस्से से देखने लगें. या गुस्सा हो जाएं. तभी मुझे ख्याल आया कि ऐसा करता हूं कि खाली फ़्लैश मार देता हूं. किसे पता चलेगा कि फोटो ली है कि नहीं. और ट्रिक काम कर गई. फिर फेरे के समय जो फोटो जरुरी लगती उसकी फोटो ले लेता था वरना तो फ़्लैश से काम चला लेता था. लेकिन तभी कोई महिला फेरों के बीच ही बोली, ' यो कैमरा वाला हमारी फोटो नहीं लेता खाली फ़्लैश मारे है बस.' और मेरी पोल खुल गई. आजतक पता नहीं यह पोल खुली तो कैसे खुली. फिर बाद में ही लड़कों वालों की तरफ से बताया गया कि ये कोई कैमरा वाला नहीं है ये तो दूल्हे का दोस्त है!!

खैर अब यहां ना वो दोस्त है. ना ही अब यहां वो दही वाले या कुल्फी वाले आते हैं। और ना ही अब वो भूस की टाल है. यहां तो अब बस मैं हूं, ये मोहल्ला है. या फिर पुरानी यादें हैं!

Sunday, September 10, 2023

मेरी पहली साइकिल और उसकी यादें

आज सुबह 'आशीष जी' ने फेसबुक पर एक पोस्ट साइकिल पर डाली. उस पोस्ट को पढ़कर हमारी दबी हुई इच्छा जाग-सी गई. दरअसल मैं खुद भी कई साल से एक साइकिल खरीदना चाहता था. उसी से सुबह टहलने जाना चाहता था. उसी से थोड़ा घूमना भी चाहता था. यह इच्छा कोरोना काल में पैदा हुई थी. जब घर में बैठे-बैठे पागल सा हो रहा था. तब यह तमन्ना कभी सो जाती थी और कभी जाग जाती थी. जागने और सोने की अपनी-अपनी वजह थीं.
आज जब 'आशीष जी' ने पोस्ट डाली तो यह तमन्ना फिर से जाग गई. इसके साथ-साथ पुरानी यादें भी फिल्म की तरह मेरी आंखों में चलने लगीं. शायद तब मैं कक्षा 9 या कक्षा 10 में पढ़ता था. ट्रीगोनोमेट्री समझ नहीं आती थी. इसलिए ट्यूशन लगाना पड़ा. ट्यूशन घर से थोड़ा दूर था और वो भी रात को था. इसलिए साइकिल की जरूरत महसूस हुई. घर पर बताया कि मुझे अब साइकिल चाहिए. पिताजी ने कहा ठीक है ले देंगे. हम खुश.
दो एक दिन बाद ऑफिस से पिताजी के साथ उनके एक दोस्त आ गए, जोकि किसी साइकिल की दुकान वाले को जानते थे. उन्होंने आते ही पूछा कि एटलस की साइकिल लेगा या हीरो की. मैंने तपाक से कहा ये वाली साइकिल नहीं लूंगा ( वो साइकिल जो उन दिनों आम थी. अंकल लोग उसे ही लेते थे. उसका नाम क्या है पता नहीं.) मैं तो बस 'रेंजर' साइकिल लूंगा. शायद रेंजर तब आई-आई थी या फिर कुछ एक साल हो गए थे. 'रेंजर' थोड़ी महंगी साइकिल थी. पिताजी की पॉकेट शायद तब उसे खरीदने के लिए हां ना कहती होगी. अंकल जी ने मुझे 'रेंजर' के ना जाने कितने नुकसान बताए लेकिन मैं टस से मस नहीं हुआ. कुछ दिन यूं ही बीत गए.
फिर एक दिन क्या देखता हूं पिताजी के साथ वो अंकल जी 'रेंजर' साइकिल लेकर आ गए. मैं खुशी से झूम उठा. ऐसे खुश था जैसे मेरे लिए बाइक आ गई हो. कई दिनों तक तो मेरे जमीन पर पैर ही नहीं थे. खुशी-खुशी में फिर ना जाने उसमें मैंने क्या-क्या लगवाया वो तो अब याद नहीं लेकिन ये याद है कि कुछ दिन बाद मैंने उसमें एक हूटर लगवा था. जैसा पुलिस की गाड़ियों का होता है. जब भी रात को मैं ट्यूशन से घर आता था तो ट्यूशन सेंटर से लेकर घर तक वो बजता रहता था. और मोहल्ले के लोग कहते थे कि हो ना हो ये सुशील ही होगा. और तो और जहां ट्यूशन पढ़ने जाता था. वहां के लोग भी इसी वजह से पहचाने लगे थे. एक अलग ही टशन थी. जोकि अब बेहद ही खराब लगती है.
जब कुछ दिनों पहले गली से ऐसे ही सायरन बजाती कोई साइकिल गुजरी तो मुझे अपनी यादें याद आने लगीं. और मैं अपनी बेटी को इन यादों को सुनाने लगा. वह यह सब सुनकर कहने लगी, 'अब पुरानी रट मत लगाने लगना कि मैंने साइकिल खरीदनी है.' फिर मैं बोला, 'मन तो अब भी होता है कि साइकिल खरीद ही लूं. 'अपनी कॉलोनी देखी है. और आपका दो दिन का शौक रहेगा. फिर वो यूं ही खड़ी रहा करेगी.' बेटी बोली. और मैं चुप्पी मारकर रह गया.
शायद अगले दिन या दो एक दिन के बाद रात को सायरन बजाती वही साइकिल गली से फिर गुजरी. उसे सुनते ही बेटी बोली,' पापाजी पापाजी देखो आपका बचपन जा रहा है.'

Saturday, July 1, 2023

आधे-अधूरे ख्याल-1

💭

वे अपने-अपने हिसाब से चलते रहे 
वो उनके हिसाब से बदलता रहा! 

💭

रिश्ते 
सब के सब 
अपने-अपने 
खून के साथ 
खड़े हो गए. 

एक वो था 
जो सही के साथ 
खड़ा रहा
और 
अकेला रह गया. 
💭

वो अपने ही घर में 
किराएदार हो गया 
लोग कहते हैं कि 
वो अपनी जिंदगी में 
नाकामयाब हो गया. 

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