Tuesday, February 26, 2013

मोहन राकेश और उनके किस्से, भाग-1

अगर कहीं एक ऐसा शख्स दिखाई पड़े, जो सिल्क की निहायत लंबे कालरवाली कमीज पहने हो, जिसके कफ कोट की बांहों से छह अंगुल बाहर निकले हों और उनमें एकदम पुरानी चाल के कफ-बटन हों, जिसकी टाई की गांठ ढीली मुट्ठी की तरह गर्दन में बेतरतीबी से कसी हो, कीमती कपड़े की पैंट जिस पहननेवाले से पनाह मांग रही हो और जो गोल्ड फ्लैक की सिगरटें जला-जलाकर खा रहा हो और माचिस की तीलियां, राख और टुकड़े निहायत साफ-सुथरी और सजी जगहों में फेंकता जा रहा हो और बात-बात पर आसमान-फाड़ ठहाके लगाता हो और लेखक के बजाय किसी बार का रईस, पर पहली नजर एकदम गावदी प्रोपराइटर लगता हो, तो समझ लीजिए कि वह राकेश है। अगर वह राकेश न भी हुआ तो वह राकेशनुमा आदमी आपको उसका अता-पता बता देगा,“ आप उन साहब को पूछ रहे हैं! जी हां, कल ही उन्होंने यहां टेबल रिजर्व कराई थी, चार-पांच दोस्तों के लिए ... पैसे भी दे गए थे, पर आए नहीं!"...

दिल्ली से कटा हुआ कीर्ति नगर इधर-उधर खाली पड़े हुए प्लॉट, जहां शाम सात बजे से खामोशी छा जाती थी। जब भी वहां बैठता, तो कुछ देर के लिए उसके ठहाकों से दीवारें हिलने लगतीं, पर के क्षण बाद ही बड़ी गहरी खामोशी छा जाती। भीतर से बुलावा आता,“ राकेश जी.... और जब वह लौटता, तो उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में एक अजीब-सा बेगानापन दिखाई पड़ता और फिर अपनी परेशानी को दबाता हुआ कहता, “चलो डियर, कनॉट प्लेस चलते हैं!” और घर से बाहर आते ही वह अपने फॉर्म में आ जाता। वही चुभती हुई बातें, यारों के किस्से और ठहाके! वह हंसता, तो तारों पर बैठी हुई चिड़ियां पंख फड़फड़ाकर उड़ जातीं, और राह चलते ऐसे चौंककर देखते, जैसे किसी को दौरा पड़ गया हो ! ...

7 फरवरी 62 की सर्द सुबह जब वह मेरे घर आया, तो एकदम टूटा हुआ था, पैसे के दुश्मन ने अपना पर्स देखा और साठ-सत्तर रुपए देखकर बोला, “ राजपाल से पैसे लेने हैं! जेब में आज पाई नहीं है......” मै गौर से उसे देख रहा था, अभी-अभी उसने अपनी आंखे चोरी से सुखाई थी, कुछ क्षण खामोश रहकर सोचा था और तंगद्स्ती में भी टैक्सी लेकर मेरे साथ निकल पड़ा था.... टैक्सी से उतरते ही उसने टैक्सी वाले को पांच रुपए इनाम के थमा दिए थे और आगे बढकर गोल्ड फ्लैक का एक टिन खरीद लिया था। दोपहर में हम अलग हो गए। वापस घर आया, तो राकेश की एक चिट पड़ी थी और बियर की दो बोतलें- दोनों खाली- एक में दो घूंट बियर और सिगरेट के टिन में एक सिगरेट – बाकी वह सब पी गया था और चिट पर लिखकर छोड़ गया था, “ कोशिश करुंगा कि रात नौ-साढे नौ बजे फिर आऊं। स्थिति काफी गंभीर है। तुम्हें एक काम अवश्य करना है। सुबह फ्रंटियर मेल पर पुरानी दिल्ली स्टेशन से अम्मा को रिसीव कर लेना और उन्हें साथ यहीं ले आना... मैं किसी भी समय आकर मिल लूंग़ा ! “और इस मुसीबत के समुद्र में डूबते-उतरते हुए भी उसकी विनोद वृति मरी नहीं थी, अंत में चिट पर लिख गया था, “तुम्हारे हिस्से की बियर और सिगरेट छोड़े जा रहा हूं।“  उसे उस वक्त कोसकर सिगरेट तो मैंने सुलगा ली थी, पर तली में पड़ी हुई दो घूंट बियर बोतल समेत फेंक दी थी।......

वह इस बात का भूखा है कि कोई उसका है! यही उसकी अनवरत तलाश है ... कोई उसका है और वह किसी का है – चाहे वह मां हो, दोस्त हो, बीवी हो, या दो दिन का मुलाकाती! वह एकाएक अपना सब कुछ दे बैठता है, कहता कुछ भी नहीं, पर जिससे एक बार मिल लेता है, उसे वह गैर नहीं समझता। वह उसकी जिंदगी के दायरे में आ जाता है। अगर ऐसा न होता, तो कश्मीर में वह तीन दिन परेशान न घूमता। राकेश जब पहलगाम पहुंचा, तो तय यही था कि सब दोस्त तम्बू लगाकर रहेंगे और सबके तम्बू अलग-अलग होंगे। राकेश पिछले साल भी पहलगाम आ चुका था और एक तम्बूवाले से तम्बू लगवाकर रह चुका था। पहलगाम पहुंचने पर पता लगा कि वह तम्बूवाला श्रीनगर गया हुआ है। वहां और भी बहुत-से तम्बूवाले थे, जो उसे घेर रहे थे, पर वह तीन दिन तक उस जरा-सी जान-पहचान के तम्बूवाले के लिए इंतजार करता रहा और जब वह वापस आया, तभी उसने अपना तम्बू लगवाया। और गुरुद्वारा रोड के टैक्सी स्टैंड पर जब आठ महीने बाद एक दिन फिर वह मेरे साथ पहुंचा, तो वह उसी टैक्सीवाले को खोज रहा था, जिसने उसे मुसीबतजदा दिनों में बहिफाजत पूरी दिल्ली घुमाई थी और जिसका नाम तक उसे याद नहीं था। और इस मायने में कम्बख्त की किस्मत भी जोरदार है – जिसे वह चाहता है, वह मिल भी जाता है।......... 

जिंदगी की गंभीर-से-गंभीर और अहम बातों को सुलझाने के लिए उसके पास कई नुसखे हैं। एक नुसखा बहुत ही लाजवाब है और उन सभी साहित्यकारों के लिए फायदेमंद है, जो नौकरियों में लगे हुए हैं और हर क्षण नौकरी छोड़ने की बात करते हैं। वह आपसे गंभीरता से पूछेगा, “नौकरी छोड़ने की बात सोच रहे थे? ”

“हां !”

“कुछ तय नहीं कर पा रहे हो ?”
“ हां ! “

“सुबह दस बजे कपड़े पहनकर दफ्तर जाने का उत्साह मन में होता है ?”

“इसका क्या मतलब ?”

“अगर कपड़े बदलकर दफ्तर जाने को मन करता हो, तो तुम्हें नौकरी करनी चाहिए, अगर न करता हो , तो छोड़ देनी चाहिए! और कुछ सोचने की जरुरत नहीं है- सीधा-सादा नुसखा है...

भविष्य की चिंता कीजिए तो एक और नुसखा उसके पास है, “कम-से-कम पांच सौ में गुजारा हो जाएगा ! है ना ? तो सूद पर तीन हजार कर्ज लो और आराम से बेफिक्र होकर छह महीने में छह हजार का काम करो, फिक्र किस  बात की है। "

भारतीय डेलीगेशन का अपना लीडर चुना जा रहा है। कोई साहब कहते हैं – मिनिस्ट्री की राय है कि अमुक को चुना जाए। वह अमुक अभी अनुपस्थित है। आने वाला है। राकेश भन्नाता हुआ सिगरेट का पैकेट निकालता है । उसमें सिगरेट नहीं है। एक क्षण वह सिगरेट के लिए झुंझलाता है, फिर वहीं से बहुत ऊंची आवाज में नाराजी से बोलता है- अगर सरकार ही सब तय करेगी तो हम यहां किसलिए हैं? हम जो लीडर चुगेंगे वह लीडर होगा। अगर इस तरह सरकार के डिक्टेट्स माने जाऐंगे तो मैं इसके विरोध में वाकआऊट करता हूं। मैं उसे हाथ के दवाब से समझाकर बैठा लेता हूं। धीरे से कहता हूं- सिगरेट लाने के लिए वाकआउट करने की जरुरत नहीं है। वह यों भी आ सकती है। वह हंस देता है- तू नस पकड़ लेता है, पर यहां दूसरा मसला भी है...

एयरपोर्ट चलने से पहले वह परेशान है। पुरवा के लिए खिलौना लेना है। इतवार। बाजार बंद है। सोचा, दादर से होते हुए निकल जाऐंगे। वह खुला होगा। फिर वक्त नहीं रहा। सीधे एयरपोट पहुंच गए। लाऊंज में पहली कतार की आखिरी तीन कुर्सियों में से अतिंम वाली छोड़कर शेष दो पर बैठे हम कॉफी पी रहे है। वह बहुत उदास है। भरा-भरा, थका-थका।

इस बार बहुत थक गया हूं, दिल्ली जाकर खूब सोऊंगा।

-मैं शायद पहली तारीख को आऊं।

-आना तो जगा लेना। वह फिर चश्मे के भीतर से झांककर कहता है...

फोन पर एक आवाज –दिल्ली में कुछ हो गया है। फौरन मालूम करिए......

दिल्ली का वही एयरपोर्ट है। वही रास्ता है। और वही राजेन्द्रनगर है। शायद जिंदगी की हलचल भी वही रही हो। पर भयानक सन्नाटा है। आज हलचल में कोई आवाज नहीं है। पेड़ो में हवा नहीं है। हवा में जान नहीं है। वही छोटा-सा फाटक। वही टूटी हुई प्राम, बाईं दीवार से लगी खड़ी। जीने का दरवाजा खुला हुआ। ऊपर घर का दरवाजा खुला हुआ। जैसे यहां कोई नहीं रहता। गलत घर तो नहीं है? मैं अपने इस घर का पता तो नहीं भूल गया? पहला कमरा- सब हैं। जैसे कोई नहीं पहचानता। दूसरा कमरा-वहां भी कुछ हैं। वे भी नहीं पहचानते। बरामदा- दो-तीन लोग वहां भी हैं, वे भी नहीं पहचानते। मैं ही किसी को कहां पहचान पा रहा हूं। आखिरी कमरा- उसमें सफेद चादर ओढ़े कोई लेटा है-वह भी नहीं पहचानता। शायद देख नहीं पाया। मैं सिरहाने बैठकर चादर हटाता हूं।

सुन!

राकेश नहीं सुनता।

-देख तो..

वह नहीं देखता।

-अरे जाग तो।

वह नहीं जागता....

कुछ भी बीता नहीं है। लोग कहते हैं, वह सैंतालीस साल का था। दोस्त की कोई उम्र होती है? दोस्त और मां- ये हमेशा अपनी उम्र के होते हैं। बाकी सबकी उम्रों में फर्क होता है।.....

और जो अपने वक्त की उम्र हासिल कर ले, वह क्या होता है। उसका क्या नाम होता है ? एक नाम मोहन राकेश होता है। 

( नोट- मोहन राकेश पर लिखा कमलेश्वर का यह संस्मरण " मेरा हमदम मेरा दोस्त " किताब से लिया गया है। इस किताब का प्रकाशन " किताबघर" ने किया है। और यह संस्मरण 14 पेज का है इसलिए इसके कुछ हिस्से लाया हूँ।)

 

Monday, September 10, 2012

मैं जिंदा हूँ




मन होता नहीं, किसी से मिलने के लिए
दिल पसीजता नहीं, जरुरतमंदो के लिए.
खुली आंखें देखती हैं, जुल्म होते हुए
हाथ उठते नहीं, जुल्मी लोगों के लिए.
जुबान खुलती नहीं, अपने हक के लिए
पैर चलते नहीं, सत्य की आवाज़ के लिए.
दिमाग सोचता नहीं, अपने देश के लिए
फिर भी लोग कहते हैं कि, मैं जिंदा हूँ !


Friday, May 11, 2012

घी के दिए जलाऐंगे, मंटो का जन्मदिन मनाऐंगे...

लम्बा-तिरछा , चपटा, गोरा-गोरा, हाथ की पीठ पर नसें उभरी हुईं, कंठ की घंटी बाहर निकली , सूखी टांगो पर बड़े- बड़े पांव, लेकिन  बेडौल नहीं, स्त्रैणता लिए हुए अजीब सी नफासत, चेहरे पर झुंझलाहट, आवाज में बेचैनी....... मंटो को पहली बार देखकर कुछ  इन बातों का अहसास  होता है।  वह अपने बुजुर्गों की इज्जत करता है, मुहब्बत नहीं। अदब-आदाब में, आचार-व्यवहार में, दृष्टिकोण में दोनों तरफ इतना घोर मतभेद था कि मंटो ने बचपन से ही अपना घर छोड़ दिया था और अपने लिए नया पथ खोजना शुरु कर दिया था। अलीगढ़ , लाहौर, अमृतसर, बम्बई, दिल्ली- इन स्थानों ने मंटो की जिंदगी को कई रंगो में देखा है। रुसी साहित्य का पुजारी मंटो, चीनी साहित्य का प्रेमी मंटो, कटुता और निराशा का शिकार मंटो, गुमनाम  मंटो, बदनाम मंटो, भटियार- खानों, शराबखानों और चकलों में जाने वाला मंटो और फिर घरेलू मंटो, मुहब्बत करने वाला मंटो, दोस्तों की मदद करने वाला मंटो.... उर्दू का सुविख्यात  लेखक मंटो...वह हजार बार कहता है, मुझे इंसानों से मुहब्बत नहीं है। मैं एक गले-सड़े कुत्ते के पिल्ले से मुहब्बत कर लूंगा, लेकिन  इंसानों से नहीं। वह कहेगा, " मुझे मैत्री, द्या, करुणा , प्यार- किसी पर विश्वास नहीं। मेरा विश्वास  शराब  पर है। यह प्रगतिशीलता सब बकवास है। मैं प्रगतिशील नहीं हूँ। मैं सिर्फ  मंटो हूँ और शायद वह भी नहीं हूँ....

मंटो की बातों में हास्य , अनोखापन ज्यादा होता है। दुनिया के किसी विषय पर पर उससे बात कीजिए , वह उस पर एक नए अंदाज से बात करेगा।  आम रास्तों से बचकर चलने की आदत अब उसके मिजाज का एक  अंग बन गई है। वह उसे छोड़ नहीं सकता- आप यदि दास्तवस्की की प्रशंसा करें तो वह सॉमरसेट मॉम के गुण गाएगा। आप बम्बई शहर की खूबियां गिनाऐंगे तो वह अमृतसर की तारीफ के गीत गाने लगेगा। आप जिन्ना या गांधी की महानता के कायल होते नजर आएंगे तो वह अपने मुहल्ले के मोची की महानता जताने लगेगा।  आप गोश्त और पालक पसंद फरमाएंगे तो वह आपको दाल खाने की तरगीब देगा। आप शादी करना चाहेंगे तो वह आपसे कुंआरा रहने को कहेगा।  आप कुंवारेपन को अच्छा समझेंगे तो वह शादी की उपयोगिता पर बहस करके आपको शादी के लिए मजबूर करेगा।  आप उसके एहसान का जिक्र करेंगे तो वह आपको बुरा- भला कहेगा, आप उसे गाली देंगे तो वह आपके लिए पांच सौ की नौकरी ढूंढता फिरेगा- मंटो के मिजाज की तरह उसकी दोस्ती , दुश्मनी और उसका प्रतिशोध भी अजीब है और उसमें सच्ची मानवता के बहुत से पहलू पाए जाते हैं। उसकी कठोरता , निर्भीकता और कटुता एक तरह का एक खोल है, जो उसने अपने नर्म व्यक्तिव की सुरक्षा के लिए अपने ऊपर चढ़ा रखा है। अपने आपको दूसरों से एकदम अलग दिखाने की इच्छा वास्तव में इसके सिवा और कुछ नहीं है कि वह अंदर से बिल्कुल हमारे जैसा है, बल्कि हमसे ज्यादा जख्मी है, ज्यादा भावुक है, ज्यादा हमदर्द है....

मैंने मंटो को रोते हुए भी देखा है। वह अपने डेढ़ वर्ष के बच्चे की मौत पर रो रहा था । उसका गला रुंधा हुआ था और उसके पपोटे सूजे हुए थे और उसने मुझसे कहा " कृशन, मैं मौत से नहीं डरता, किसी मौत का असर नहीं लेता। लेकिन यह बच्चा- इसलिए नहीं कहता हूं कि यह मेरा बच्चा है- इसलिए कहता हूं - तुम इसे देखते हो न, इस वक्त भी कितना मासूम , कितना नया, कितना प्यारा मालूम होता है। मैं सोचता हूँ कि जब कोई नया ख्याल अपने खात्मे तक पहुंचने से पहले टूट जाता है, उस वक्त कितना बड़ा सानहा होता है। हर नया बच्चा एक नया ख्याल है। यह क्यों टूट गया? अभी मैंने इसे तड़फते देखा है। मैं मर जाऊं, तुम मर जाओ, बुढ्ढे, जवान, अधेड़ उम्र के लोग मर जाए, मरते रहते हैं, लेकिन यह बच्चा - फितरत ( प्रकृति) को किसी नए ख्याल का इतनी जल्दी न गला घोंटना चाहिए।" और फिर वह फूट-फूटकर रोने लगा। उसने जो खोल अपने ऊपर चढ़ा दिया था, उसके टुकड़े-टुकड़े हो चुके थे....

मंटो की जिंदगी की बहुत सी ऐसी बातें हैं जो उसकी जिंदगी में नहीं कहीं जा सकती  और इसलिए लिखी भी नहीं जा सकती। लेकिन एक घटना मैं यहां लिखे बिना नहीं रह सकता.... अचानक मेरी मुलाकात मंटो से रेलगाड़ी में हो गई। कोई दस पन्द्रह मिनट तक हम लोग इकटठे रहे। इधर-उधर की बातों के बाद मंटो ने एकाएक मुझे पूछा, " भई मैंने पूना में एक लड़की "शे" साहब के पास भेजी थी, ऐक्ट्रेस बनने की ख्वाहिश रखती थी। उसका क्या हुआ?" मैंने कहा- " वह लड़की तो "प " साहब के पास है आजकल।" फिर मैंने पूछा , " तुमने उसका अध्ययन किया होगा?" मंटो ने अत्यंत गंभीर होकर कहा , " लाहौल विला कूवत! मैं तो सिर्फ तवायफों का अध्ययन करता हूँ। मैं शरीफ लड़कियों के नजदीक नहीं फटकता।" यह मंटो का खास अंदाज है। फिर उसने रुककर कहा- " मुझे तो बेचारी बड़ी शरीफ मालूम होती थी, किंतु पेट बुरी बला है।" फिर वह देर तक चुप रहा। और मैंने महसूस किया कि इस इंसान के अंदर कितनी झिझक, शर्म की पाकीजगी है। वह औरत को कितनी साफ सुथरी, पवित्र और इस्मत-परवर देखना चाहता है। और जब कोई जिंदगी और सृष्टि और सौन्दर्य के स्त्रोत को गंदगी और मल से पाक देखना चाहे तो उसके स्वस्थ दृष्टिकोण के प्रति कोई संदेह नहीं रहता, उसकी साहित्यिक ईमानदारी को स्वीकार करना ही पड़ता है। कम से कम मुझे इसका पूरा विश्वास है। यह अलग बात है कि मंटो मुझे केवल झुठलाने के लिए दो एक कहानियां मेरे दांवे को गलत साबित करने के लिए लिख दे...... 

नोट- मंटो के सौवें जन्मदिन पर एक दीपक  हमारी तरफ से " मंटो: मेरा दुश्मन " किताब से कृशन चन्द्र का लिखा संस्मरण । अलग अलग टुकड़ो को एक साथ जोड़ने के लिए माफी चाहूँग। 


Sunday, November 13, 2011

नाटक- गालिब-ए-आजम और मैं

जब भी गोरा चेहरा, ऊंची नाक, चौड़ा माथा, लम्बे कान, घनी सफेद दाढ़ी, लम्बा कद, इकहरा बदन जिस पर लम्बा-सा चोगा , और सिर पर बड़ी-सी फर वाली टोपी पहनने वाले शख़्स मिर्जा असद अल्ला खां ग़ालिब उर्फ चाचा ग़ालिब का जिक्र आता है , तो उनका यह शेर बरबस ही याद आ जाता है जिसमें उनकी पूरी शख्सियत मौजूद है :

हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे।
कहते हैं कि गालिब का है, अंदाज-ए-बयां और॥

सच  में मिर्जा गालिब का अंदाज-ए-बयां न्यारा ही था। वरना मिर्जा गालिब इतने दिनों तक अपनी शेरो शायरी के बल पर लोगों के दिलों में जिंदा न रह पाते। मैं तो अब तक शेरो शायरी का मतलब मिर्जा गालिब और मिर्जा गालिब का मतलब शेरो शायरी समझता रहा था। मैंने जब भी गालिब की शेरों शायरी की तरफ अपने कदम बढाये, फारसी के कठिन शब्द हमेशा गतिरोध की तरह बीच में आ खड़े हुए। इसके इतर मिर्जा गालिब के बारे में यही जाना कि शायर तो वो अच्छे थे पर बदनाम बहुत थे। इससे अधिक कुछ नहीं जाना। यह संयोग था कि जब सी. डी. सिद्धू  सर का लिखा नाटक " गालिब-ए-आजम" देखा तो मैं मिर्जा गालिब की शेरो शायरी के साथ-साथ उनका भी मुरीद हो गया। इस नाटक से मुझे मिर्जा गालिब की शख्सियत के कई पहलुओं से रुबरु होने का मौका मिला। नाटक में सी. डी. सिद्धू सर ने मिर्जा गालिब की जिंदगी के तीन अहम पन्नों को इतनी खूबसूरती से पेश किया है, मानो ऐसा लगा जैसे मिर्जा गालिब दोबारा जिंदा हो गए हों।

यूं तो मिर्जा गालिब और बदकिस्मती दोनों साथ-साथ चलते हैं, किंतु इस नाटक में गालिब के उस एक रुप को जब जाना तो मैं उनके हौंसले का कायल हुए बगैर नहीं रह सका, जब पूरी पेंशन न मिलने के कारण उन्हें मुफलिसी में गुजर-बसर करना पड़ी। जिंदगी के सुनहरे दिनों में वो सिर तक कर्ज में डूबे रहे। रोज-ब-रोज दरवाजे पर कर्जख्वाहों के तकाजे मिर्जा गालिब की बेगम उमराओं जान को परेशान करते रहे। एक वक्त ऐसा भी आया जब मिर्जा गालिब के खिलाफ डिक्रियां निकलने लगी। जिसकी वजह से मिर्जा गालिब का गृहस्थ जीवन तनावों से घिरता रहा। मगर क्या मजाल कि इस फनकार को अपने फन से कोई तकलीफ जुदा कर पाती। यहां तक कि तनावो के बीच मिर्जा गालिब अपने नन्हें-नन्हें बच्चों को फौत होते देखता रहा और अंदर ही अंदर रोता रहा। शायद तभी उनकी कलम से यह शेर निकला :

मेरी किसमत में गम अगर इतना था ।
दिल भी, या रब्ब , कई दिये होते ॥

गालिब का दूसरा रुप इस नाटक में बखूबी तौर पर सामने आया है। जब फीरोजपुर झिरका व लोहारु के राजा नवाब अहमद खां की अनिकाही बेगम मुद्दी का बेटा शम्स अलादीन पूरी पेंशन ना देने की दगाबाजी लगातार करता रहा। और जब मिर्जा गालिब के सिर के ऊपर से पानी गुजरने लगा, तब वह इस बेइंसाफी के खिलाफ यह कहते हुए उठ खड़ा हुआ कि जिस कलमकार ने खुद जिंदगी से जूझना नहीं सीखा, मुश्किलात को शिकस्त देना नहीं सीखा, वो दूसरों को क्या सिखाऐगा? एक डरपोक ऐसी नज्म नहीं कह सकता , जो दूसरों को बहादुर बनाए। एक कायर ऐसा शेर नहीं कह सकता जो सामईन के अंदर नई रुह फूंके। और वह अपनी पेंशनी हक की लड़ाई के लिए बनारस से होते हुए कोलकाता पहुंचकर अपने साथ किए गए धोखे के खिलाफ मुकदमा दायर करता है। बेशक यह इतिहास में दर्ज है पर यह सिद्धू सर के इस नाटक की खासियत है कि नाटक का नायक लाचारी, गुरबत और ढेरों तकलीफों के बीच रहते हुए भी बेईमानी और बेइंसाफी के खिलाफ जंगजू की तरह खड़ा हो जाता है, और दर्शकों को मुश्किलों से लड़ने का जज्बा देता है। यह अलग बात है कि चंद साल बाद ही वह पेंशन का मुकदमा खारिज होने के कारण एक बार फिर सदमे से गुजरता है। मगर नाटक के नायक मिर्जा गालिब की ही ताकत थी कि तमाम तकलीफों से भरी जिंदगी में भी इंसानियत का दामन पकड़े हुए कहता है :

हम कहां के दाना थे, किस हुनर में यक्ता थे ।
बेसबब हुआ गालिब दुश्मन आसमां अपना ॥

सिद्धू सर के लिखे नाटकों में लगभग हर नायक की भांति ही मिर्जा गालिब की भी परिस्थितयां, हालात, हमेशा दुश्मन बने रहे। मगर इन हालात और तकलीफों के बीच से ही नाटक का नायक एक नया जीवन दर्शन, एक नई जीवन पद्धति, जीवन जीने का तरीका, अपनी बनारस और कोलकाता की यात्राओं में से खोज निकाल लाता है। इन दोनों शहरों की माटी की महक, जीवनशैली, संस्कृति को देखकर नायक की सोच में आए बदलावों को इस नाटक में भरपूर जगह दी गई है। बल्कि यूं कहूं कि अन्य नाटककारों ने इसका बस जिक्र भर किया है परतुं सिद्धू सर ने मिर्जा गालिब की जिंदगी में से जीवन के अध्यात्म को, उसके दर्शन को, अपने नाटक में पूरी तरह उंडेल दिया है। और यही इस नाटक की आत्मा है। मिर्जा गालिब का इस नाटक में यह तीसरा रुप है। जब वह बनारस की "चिरागे दैर" की रोशनी में इल्म को पाता है और कहता है : बनारस के कयाम ने मेरी सोच बदल दी। इन दिनों बहुत कुछ पता चला है मुझे। मजहब के बारे में। दीन धर्म के बारे में। धर्म के नाम पर पुजारियों ने, मुल्लाओं ने, फर्जी किस्से कहानियां घड़ रखे हैं। गरीबों को दौजख के खौफ दिखाकर , जन्नत के झूठे ख्वाब बुनकर, फुसला रखा है । ये तो पहले ही बेचारे भूख के मारे हैं, बीमारियों के सताये है, मौत के दहलाये हैं। ऊपर से पंडित और मुल्लाओं के ये ढ्कौसले। यह जुल्म है। यह खाओ, वो न खाओ। यह पियो, वो न पियो। नमाज पढ़ो । रोजा रखो। बुतो को मत पूजो। गालिब आगे कहता है: पुराने तौर तरीके बदलों। खुदा खोखली रस्मों रीतों में नही घुसा बैठा। खुदा आपसी मोहब्बत में है।

गालिब यहीं नहीं रुकते बल्कि अपनी आंखों में संत रविदास के बेगमपुर का ख्वाब देखते है, " जहां किसी को कोई गम न हो। सब जमीन जायदाद साझे में हो। बराबर हों सब लोग। कोई ऊंच नीच न हो। हर एक को रोटी मिले। कपड़ा मिले। वहीं दूसरी ओर गालिब जब कोलकाता की आधुनिकता के उजाले में खुद को खड़ा पाता है तो वह उसके हर नक्श को बखूबी देखता और समझता है। वह कोलकाता की फिजा में आधुनिकता की पड़ी छौंक को पहचानता है, उसकी महक को अपने नथूनों से अनुभव करता है। जीवन में क्या आवश्यक है क्या नहीं, बारिकी से समझता है। तभी तो वो कह उठता है कि " नई दुनिया को सलाम करो। कोलकाता देखो। अंग्रेजों की नई नई इजादें देखो। हम पत्थर से पत्थर टकरा कर आग जलाया करते थे। अंग़्रेज को देखो। एक तिनके पर थोड़ा सा मसाला लगाया और छूं!  आग जल गई! बड़े बड़े जहाज चलते है समुद्र में। हजारों कोस तक। कैसे ?  भाप से! " गालिब इधर आधुनिकता की रोशनी में आगे बढ़ने की ओर इशारा करता है। और इन इशारों को समझते हुए मेरा दिल कहता है :

हुई मुद्दत कि गालिब मर गया पर याद आता है।
वो हर एक बात पे कहना कि यूं होता तो क्या होता ॥

तब मुझे लगता है कि आखिर यह "यूं " कितना गजब ढाता है। यूं होता तो क्या होता? इस यूं में क्या-क्या होता? या क्या-क्या हो सकता है? यह नाटक भी उसी की ओर आगे बढता हुआ एक कदम है। लगता है कि नाटक के लेखक सी.डी. सिद्धू सर भी आपसी मोहब्बत के धर्म , बेगमपुर के ख्वाब और कोलकाता की आधुनिकता के सपनो को अपनी आंखों में संजोये इस नाटक को रचते हैं। और इन सपनों से इंसान को इंसान बनने को प्रेरित करते हैं। इंसान को जिंदगी की तमाम तकलीफों से लड़ने के लिए जंगजू बनाते है। और एक खुशहाल, सुखी जिंदगी जीने के लिए नए-नए सपनो की राह दिखाते हैं। सी.डी. सिद्धू सर के इस नाटक " गालिब-ए-आजम" की यही तो खूबी है। और यह इस नाटक की जान है। अगर मैं " गालिब-ए-आजम " को नहीं देख पाता तो संभवत: गालिब को भी नहीं जान पाता । या यूं कहूं कि एक पूरी जिंदगी को नहीं जान पाता जो गालिब के जरिए हमें अपनी जिंदगी जीना सिखाती है। बकौल गालिब- " बेगम, यही है मेरी जिंदगी भर की कमाई। मेरा "दीवान-ए- गालिब" क्या जिंदगी बख्शी है खुदा ने। हादसों का हुजूम। मुसीबतों का जमघट। मगर मैंने हिम्मत नहीं हारी। हर मुश्किल को शेयरों में ढालता गया । हर नन्हें मुन्ने की मौत पर, मैं तहयया करता रहा, कि मैं अपने कलम से मलकल मौत से बदला लूंगा। मैं लाफानी कलाम कहूंगा। उमराओ, आज मुस्करा दो । हंस दो। " यह मुस्कराहट, खुशी, हंसी ही जीवन जीने का हौसला। और नाटक के लेखक का मकसद। जो सिद्धू सर के हर नाटक की तरह इस नाटक की पटकथा का अंत है। जब इन सुंदर पक्तिंयों के साथ मंच का पर्दा गिरता है तो "गालिब-ए-आजम" नाटक हमारे दिलो दिमाग पर छा जाता है। शायद सालों के लिए , सदियों के लिए , या फिर जीवन भर के लिए ।

- सुशील कुमार छौक्कर

नोट- यह नाटक रिव्यू "गालिब-ए-आजम" पुस्तक से लिया गया है, पुस्तक के लेखक है डॉ. चरणदास सिद्धू। और प्रकाशित हुआ है "श्री गणेश प्रकाशन"- 32/52 , गली नम्बर -11, भीकम सिंह कालोनी , विश्वास नगर, शाहदरा से ।

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