उठो बाबा
अब नहीं पूछूँगी
मेरी मम्मी कहाँ हैं ?
मेरे पापा कहाँ हैं ?
सबके तो हैं, मेरे कहाँ हैं ?
उठो बाबा।
अब कौन प्यारी आवाज लगा सुबह उठाऐगा ?
अब कौन बस्ता लेकर स्कूल छोड़कर आऐगा ?
अब कौन गोल गोल रोटी बना खिलाऐगा ?
अब कौन कहानी सुनाकर नींद को बुलाऐगा ?
उठो बाबा।
तुम कहते थे "तेरे बाप की याद आती हैं,
खुद चला गया मुझे जवान बनाकर"
क्या तुमको हमारी याद नहीं आऐगी ?
हमको यूँ बेसहारा छोड़कर
उठो बाबा।
तुम कहते थे "दुकान पर बैठा कर"
मैं कहती थी "अच्छा नहीं लगता"
अब मैं तुम्हें कुर्सी पर ऊँघने नहीं दूँगी
दुकान चलाकर खूब पैसा कमाऊँगी
उठो बाबा............................
किसी को फसल के अच्छे दाम की तलाश,किसी को काम की तलाश,किसी को प्यार की तलाश, किसी को शांति की तलाश, किसी को खिलौनों की तलाश,किसी को कहानी की तलाश,किसी को प्रेमिका की तलाश, किसी को प्रेमी की तलाश,................ तलाश ही जीवन है
Monday, February 23, 2009
Thursday, February 19, 2009
रुसी कवयित्री- मरीना त्स्वेतायेवा
कुछ रातें
कुछ रातें प्रिय के बिना
कुछ रातें अप्रिय के बिना
कुछ बड़े बड़ॆ तारे
दहकते हुए सिर के ऊपर
और कुछ हाथ
बढ़ते हुए उसकी तरफ जो सदियों से रहा नहीं और न होगा
जो सम्भव नहीं पर जिसे होना चाहिए ...................
बच्चे का एक आँशू
नायक के लिए
और नायक का एक आँशू बच्चे के लिए
पत्थरीलें पहाड़ हैं उसकी छाती में
उसे उतर आना चाहिए अब नीचे
जानती हूँ-जो हुआ
जानती हूँ-जो होगा,
जानती हूँ पूरी तरह
गूंगे-बहरे उस रहस्य को
तुतली और अबोध भाषा में जिसे
कहा जाता है जीवन
रुसी कवयित्री- मरीना त्स्वेतायेवा
साभार- वरयाक सिंह ( आधार प्रकाशन हरियाणा)
कुछ रातें प्रिय के बिना
कुछ रातें अप्रिय के बिना
कुछ बड़े बड़ॆ तारे
दहकते हुए सिर के ऊपर
और कुछ हाथ
बढ़ते हुए उसकी तरफ जो सदियों से रहा नहीं और न होगा
जो सम्भव नहीं पर जिसे होना चाहिए ...................
बच्चे का एक आँशू
नायक के लिए
और नायक का एक आँशू बच्चे के लिए
पत्थरीलें पहाड़ हैं उसकी छाती में
उसे उतर आना चाहिए अब नीचे
जानती हूँ-जो हुआ
जानती हूँ-जो होगा,
जानती हूँ पूरी तरह
गूंगे-बहरे उस रहस्य को
तुतली और अबोध भाषा में जिसे
कहा जाता है जीवन
रुसी कवयित्री- मरीना त्स्वेतायेवा
साभार- वरयाक सिंह ( आधार प्रकाशन हरियाणा)
Sunday, February 15, 2009
ब्लोग की सालगिरह
आज इस ब्लोग ने एक साल पूरे कर लिए हैं। यह सब आप सब साथियों के सहयोग से संभव हो सका हैं इसलिए आप सभी का दिल से शुक्रिया। आज के दिन इस ब्लोग की पहली पोस्ट को थोड़ा रंग बिंरगा और थोडा बदलाव करके दुबारा पोस्ट करके ब्लोग की सालगिरह मनाने का मन किया।
नैना
कोई तेरे होने पर मनाये खुशी
और कोई अफ़सोस
कोई तेरे आने पर दे बधाई
और कोई दे दिलासा
ऐसा क्यूँ होता हैं नैना ?
कोई तुझे चुनमुन पुकारे
और कोई नैना
कोई तुझे दुर्गा बोले
और कोई सुनयना
ऐसा क्यूँ होता हैं नैना ?
कोई हँसे कि तू हँसे,
कोई रोये क्योंकि तू रोये
कोई खाये कि तू खाए
कोई सोये क्योंकि तू सोये
ऐसा क्यूँ होता हैं नैना ?
कोई कहे यह लड़कियों की सदी
कोई कहे फिर भी चाहत लड़को की
कोई बोले बेटे होते बुढापे की लाठी
कोई बोले मेरी बेटी मेरे बुढापे की नैना
ऐसा क्यूँ होता हैं नैना ?
नैना
कोई तेरे होने पर मनाये खुशी
और कोई अफ़सोस
कोई तेरे आने पर दे बधाई
और कोई दे दिलासा
ऐसा क्यूँ होता हैं नैना ?
कोई तुझे चुनमुन पुकारे
और कोई नैना
कोई तुझे दुर्गा बोले
और कोई सुनयना
ऐसा क्यूँ होता हैं नैना ?
कोई हँसे कि तू हँसे,
कोई रोये क्योंकि तू रोये
कोई खाये कि तू खाए
कोई सोये क्योंकि तू सोये
ऐसा क्यूँ होता हैं नैना ?
कोई कहे यह लड़कियों की सदी
कोई कहे फिर भी चाहत लड़को की
कोई बोले बेटे होते बुढापे की लाठी
कोई बोले मेरी बेटी मेरे बुढापे की नैना
ऐसा क्यूँ होता हैं नैना ?
Thursday, February 12, 2009
जिदंगी क्या इसी ही को कहते हैं ?
वही सुबह का अलार्म सुनकर
वही जनसत्ता पेपर पढ़कर
वही सुबह एक सा नाश्ता खाकर
वही बदलती इंसानी फ़िदरत को देखकर
वही आफिस में उंगलियाँ तोड़कर
वही भिन्नाते सिर के साथ बिस्तर पर गिरकर
मन उचट गया है
पर जिदंग़ी है कि बस कटे जा रही है
कभी माँ-बाप के बुढ़ापे की आहट में
कभी बेटी की शरारत में
कभी पत्नी की मुस्कराहट में
कभी चिड़ियों की चहचहाट में
कभी हवाओं की सरसराहट में
बहुत दिनों से मन में उथल पुथल थी। क्योंकि कई यार दोस्त और खुद मैं भी कहता रहता हूँ कि यार जिदंगी में मजा नही आ रहा। पर जीऐ जा रहे है। और कल यह सुनते ही झट से हमारा चाय वाला बोला " मजा कोई किसी के बाप का नौकर है जो किसी के कहने से आ जाएगा।" और फिर मुस्कराता हुआ पीछे से कान के पास आकर बोला कि "मेरे जैसे बन जाओ फिर देखना मजा भी आ जाऐगा।" पर मेरी समझ में नही आता कि जिसे देखो वही मुझे बदलने को कहता है, चाहे वो घरवाले हो या बाहर वाले? साथियों अब आप ही बताईए कि क्या मुझे बदलना चाहिए? वैसे मैं जल्द ही अपनी अलमारी पर भगत सिंह जी की लिखी दो लाईनें लगाने वाला हूँ। जब से ये लाईने पढ़ी है तब से दिल को बहुत भा गई हैं। आप भी पढ़िए। नोट- हर पोस्ट के बोनस के रुप में सीधे हाथ की तरफ से सबसे ऊपर भी मेरी पसंद का कुछ लिखा होता है उसे भी पढ़ा करें। शुक्रिया।
इन दीवाने दिमागों में ख्वाबों के कुछ लच्छे हैं,
हमें पागल रहने दो, हम पागल ही अच्छे हैं।
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