Friday, May 11, 2012

घी के दिए जलाऐंगे, मंटो का जन्मदिन मनाऐंगे...

लम्बा-तिरछा , चपटा, गोरा-गोरा, हाथ की पीठ पर नसें उभरी हुईं, कंठ की घंटी बाहर निकली , सूखी टांगो पर बड़े- बड़े पांव, लेकिन  बेडौल नहीं, स्त्रैणता लिए हुए अजीब सी नफासत, चेहरे पर झुंझलाहट, आवाज में बेचैनी....... मंटो को पहली बार देखकर कुछ  इन बातों का अहसास  होता है।  वह अपने बुजुर्गों की इज्जत करता है, मुहब्बत नहीं। अदब-आदाब में, आचार-व्यवहार में, दृष्टिकोण में दोनों तरफ इतना घोर मतभेद था कि मंटो ने बचपन से ही अपना घर छोड़ दिया था और अपने लिए नया पथ खोजना शुरु कर दिया था। अलीगढ़ , लाहौर, अमृतसर, बम्बई, दिल्ली- इन स्थानों ने मंटो की जिंदगी को कई रंगो में देखा है। रुसी साहित्य का पुजारी मंटो, चीनी साहित्य का प्रेमी मंटो, कटुता और निराशा का शिकार मंटो, गुमनाम  मंटो, बदनाम मंटो, भटियार- खानों, शराबखानों और चकलों में जाने वाला मंटो और फिर घरेलू मंटो, मुहब्बत करने वाला मंटो, दोस्तों की मदद करने वाला मंटो.... उर्दू का सुविख्यात  लेखक मंटो...वह हजार बार कहता है, मुझे इंसानों से मुहब्बत नहीं है। मैं एक गले-सड़े कुत्ते के पिल्ले से मुहब्बत कर लूंगा, लेकिन  इंसानों से नहीं। वह कहेगा, " मुझे मैत्री, द्या, करुणा , प्यार- किसी पर विश्वास नहीं। मेरा विश्वास  शराब  पर है। यह प्रगतिशीलता सब बकवास है। मैं प्रगतिशील नहीं हूँ। मैं सिर्फ  मंटो हूँ और शायद वह भी नहीं हूँ....

मंटो की बातों में हास्य , अनोखापन ज्यादा होता है। दुनिया के किसी विषय पर पर उससे बात कीजिए , वह उस पर एक नए अंदाज से बात करेगा।  आम रास्तों से बचकर चलने की आदत अब उसके मिजाज का एक  अंग बन गई है। वह उसे छोड़ नहीं सकता- आप यदि दास्तवस्की की प्रशंसा करें तो वह सॉमरसेट मॉम के गुण गाएगा। आप बम्बई शहर की खूबियां गिनाऐंगे तो वह अमृतसर की तारीफ के गीत गाने लगेगा। आप जिन्ना या गांधी की महानता के कायल होते नजर आएंगे तो वह अपने मुहल्ले के मोची की महानता जताने लगेगा।  आप गोश्त और पालक पसंद फरमाएंगे तो वह आपको दाल खाने की तरगीब देगा। आप शादी करना चाहेंगे तो वह आपसे कुंआरा रहने को कहेगा।  आप कुंवारेपन को अच्छा समझेंगे तो वह शादी की उपयोगिता पर बहस करके आपको शादी के लिए मजबूर करेगा।  आप उसके एहसान का जिक्र करेंगे तो वह आपको बुरा- भला कहेगा, आप उसे गाली देंगे तो वह आपके लिए पांच सौ की नौकरी ढूंढता फिरेगा- मंटो के मिजाज की तरह उसकी दोस्ती , दुश्मनी और उसका प्रतिशोध भी अजीब है और उसमें सच्ची मानवता के बहुत से पहलू पाए जाते हैं। उसकी कठोरता , निर्भीकता और कटुता एक तरह का एक खोल है, जो उसने अपने नर्म व्यक्तिव की सुरक्षा के लिए अपने ऊपर चढ़ा रखा है। अपने आपको दूसरों से एकदम अलग दिखाने की इच्छा वास्तव में इसके सिवा और कुछ नहीं है कि वह अंदर से बिल्कुल हमारे जैसा है, बल्कि हमसे ज्यादा जख्मी है, ज्यादा भावुक है, ज्यादा हमदर्द है....

मैंने मंटो को रोते हुए भी देखा है। वह अपने डेढ़ वर्ष के बच्चे की मौत पर रो रहा था । उसका गला रुंधा हुआ था और उसके पपोटे सूजे हुए थे और उसने मुझसे कहा " कृशन, मैं मौत से नहीं डरता, किसी मौत का असर नहीं लेता। लेकिन यह बच्चा- इसलिए नहीं कहता हूं कि यह मेरा बच्चा है- इसलिए कहता हूं - तुम इसे देखते हो न, इस वक्त भी कितना मासूम , कितना नया, कितना प्यारा मालूम होता है। मैं सोचता हूँ कि जब कोई नया ख्याल अपने खात्मे तक पहुंचने से पहले टूट जाता है, उस वक्त कितना बड़ा सानहा होता है। हर नया बच्चा एक नया ख्याल है। यह क्यों टूट गया? अभी मैंने इसे तड़फते देखा है। मैं मर जाऊं, तुम मर जाओ, बुढ्ढे, जवान, अधेड़ उम्र के लोग मर जाए, मरते रहते हैं, लेकिन यह बच्चा - फितरत ( प्रकृति) को किसी नए ख्याल का इतनी जल्दी न गला घोंटना चाहिए।" और फिर वह फूट-फूटकर रोने लगा। उसने जो खोल अपने ऊपर चढ़ा दिया था, उसके टुकड़े-टुकड़े हो चुके थे....

मंटो की जिंदगी की बहुत सी ऐसी बातें हैं जो उसकी जिंदगी में नहीं कहीं जा सकती  और इसलिए लिखी भी नहीं जा सकती। लेकिन एक घटना मैं यहां लिखे बिना नहीं रह सकता.... अचानक मेरी मुलाकात मंटो से रेलगाड़ी में हो गई। कोई दस पन्द्रह मिनट तक हम लोग इकटठे रहे। इधर-उधर की बातों के बाद मंटो ने एकाएक मुझे पूछा, " भई मैंने पूना में एक लड़की "शे" साहब के पास भेजी थी, ऐक्ट्रेस बनने की ख्वाहिश रखती थी। उसका क्या हुआ?" मैंने कहा- " वह लड़की तो "प " साहब के पास है आजकल।" फिर मैंने पूछा , " तुमने उसका अध्ययन किया होगा?" मंटो ने अत्यंत गंभीर होकर कहा , " लाहौल विला कूवत! मैं तो सिर्फ तवायफों का अध्ययन करता हूँ। मैं शरीफ लड़कियों के नजदीक नहीं फटकता।" यह मंटो का खास अंदाज है। फिर उसने रुककर कहा- " मुझे तो बेचारी बड़ी शरीफ मालूम होती थी, किंतु पेट बुरी बला है।" फिर वह देर तक चुप रहा। और मैंने महसूस किया कि इस इंसान के अंदर कितनी झिझक, शर्म की पाकीजगी है। वह औरत को कितनी साफ सुथरी, पवित्र और इस्मत-परवर देखना चाहता है। और जब कोई जिंदगी और सृष्टि और सौन्दर्य के स्त्रोत को गंदगी और मल से पाक देखना चाहे तो उसके स्वस्थ दृष्टिकोण के प्रति कोई संदेह नहीं रहता, उसकी साहित्यिक ईमानदारी को स्वीकार करना ही पड़ता है। कम से कम मुझे इसका पूरा विश्वास है। यह अलग बात है कि मंटो मुझे केवल झुठलाने के लिए दो एक कहानियां मेरे दांवे को गलत साबित करने के लिए लिख दे...... 

नोट- मंटो के सौवें जन्मदिन पर एक दीपक  हमारी तरफ से " मंटो: मेरा दुश्मन " किताब से कृशन चन्द्र का लिखा संस्मरण । अलग अलग टुकड़ो को एक साथ जोड़ने के लिए माफी चाहूँग। 


2 comments:

सुशील छौक्कर said...

मंटो के सन्दर्भ में कोइ भी लिखे एक बात तो साफ़ होती है की सचमुच मंटो आदमी था...ऐसा आदमी जिसमे आदमीयत लबालब थी ...कई सारे संस्मरण पढ़ डाले , अफ़साने पढ़ लिए और पढ़ ली मंटो की जिन्दगी ..सबमे , सबमे एक ही मूल था वो यह की -पट्ठा क्या आदमी था....ऐसा आदमी जो सबमे रह सकता था, रहता था..रहता है...एकदम मौलिक ...निच्छल , जैसा है ठीक वैसा ही ..कोइ मुखौटा नहीं.....(अमिताभ श्रीवास्तव जी का कमेंट जो किन्हीं कारणों से पब्लिश नहीं हो पा रहा है)

Vijay Kumar Sappatti said...

manto mere priy lekhako me se ek hai .. unke jaisa likhne waal kabhi kabhi hi janm leta hai .. salaam unhe aur aapko bhi unki yaad dilaaane ke liye . dhanywaad.

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