Monday, April 5, 2010

वो

इन दिनों बड़ी उलझन में रहता हैं
जिदंगी की जालों को हटाता हैं वो।

बच्चों की मुस्कराहट पर जान छिड़कता हैं
चाँद न माँग ले ये, आँखे मिलाने से बचता हैं वो।

खुशियों की तलाश में दिन-भर घूमता फिरता हैं
खुशियों का एक अक्स भी ढूढ़ नही पाता हैं वो।

पाँच प्राणियों की पेट की आग बुझाने में इतना मशग़ूल है
अपने हडिड्यों के ढ़ाँचे को देखने में भी कतराता है वो।

रातों को पलकें बंद करने से डरता हैं
क्योंकि नींद में टूटे सपने देखता है वो।

कहता हैं वो "सुशील इस दुनिया में जी नहीं लगता
पर कमजोर बनकर दिल मरने का भी नहीं करता।

19 comments:

ताऊ रामपुरिया said...

कहता हैं वो "सुशील इस दुनिया में जी नहीं लगता
पर कमजोर बनकर दिल मरने का भी नहीं करता।

वाह, क्या बात कही है. बहुत सशक्त.

रामराम.

Amitraghat said...

सम्वेदनशील कविता....."

वन्दना said...

पाँच प्राणियों की पेट की आग बुझाने में इतना मशग़ूल है
अपने हडिड्यों के ढ़ाँचे को देखने में भी कतराता है वो।
zindagi ke katu sach ko uker kar rakh diya hai.........bahut sundar.

अविनाश वाचस्पति said...

बहुत दिन बाद लौटे हो सुशील

खूब सारे अनुभव और बेहतर शिल्‍प लेकर। अभी थोड़ा और तराशो। निश्चित है कि जल्‍दी ही एक अलग पहचान होगी। फिर मेरी तलाश की जगह रखना नाम मेरी पहचान। अच्‍छा लगा है।

Vijay Kumar Sappatti said...

susheel ji ,aaj hi tour se lauta hoon aur aapka blog sabse pahle dekha ... ye gazal padhkar kuch kah paane ki halaat me nahi hoon ....baad me kabhi kuch kah sakunga ..

vijay

रंजना [रंजू भाटिया] said...

खुशियों की तलाश में दिन-भर घूमता फिरता हैं
खुशियों का एक अक्स भी ढूढ़ नही पाता हैं वो।..
बहुत खूब ..सही लिखा है शुक्रिया

अमिताभ श्रीवास्तव said...

taraashnaa kyaa hotaa he? sirf yah ki kavitaye apne aavaran me dhali ho? mujhe lagtaa he..bhaav vyakt karti rachnaye apne aap me hi tarashi hui hoti he, khaskar ke lekhak ke dvaara../ kher..sushilji, sach me bahut dino baad aapki rachna padhhne ko mili he.

jab jindagi peda hoti he, thik tabhi se usake aaspaas duniyaai jaale bananaa shuru ho jaate he,, fir paristhitiyaa un jaalo ko kaatne-hatane ka kaam karti he,,jisaki jesi parishthiti..poori jindagi jaale hataane me hi to beet jaati he..aur jab lagtaa he ki ab me faarig huaa to jhat se bulavaa aa jaataa he....,
aur jab jindagi esi ho to bachcho ki muskuraaht par nyochchaavar hone ka man karne ke baavzood..man maar kar rah jaanaa padtaa he..fir khushiyo ki talaash kare yaa na kare..usake haath shoonya hi lagtaa he, esaa kyo hotaa he???? samjh se baahar he ham madhyam varg ke logo ke liye../
parivaar ka bharan poshan..mashgool rahe yaa na rahe use apnaa farz nibhana he, aur yadi vo nibhaa rahaa he to yakeen maaniye..insaan he vo...iska saboot aapne apni aakhir ki laaino me di hi diyaa he...
bahut khoob likhaa he, mujhe to mazaa aa rahaa he padhhne me..kisi prakaar ke taraashne ki jarurat mujhe tab nahi lagti jab aap kavi ke shbdo me utar jaaye aur poora poora mazaa le.

अमिताभ श्रीवास्तव said...

NAINA BITIYA>>
hamari KG me aa gai he..., khoob badi ho jaao aur apne mammi papa ka naam roshan karo.../ are hnaa in amitabh uncel ka bhi.../

रचना दीक्षित said...

पाँच प्राणियों की पेट की आग बुझाने में इतना मशग़ूल है
अपने हडिड्यों के ढ़ाँचे को देखने में भी कतराता है वो।

संवेदनशील हृदयस्पर्शी रचना, गज़ब का सुक्ष्मावलोकन

हरकीरत ' हीर' said...

खुशियों की तलाश में दिन-भर घूमता फिरता हैं
खुशियों का एक अक्स भी ढूढ़ नही पाता हैं वो।.

बहुत अच्छी तुकबंदी है सुशील जी ......!!

कंचन सिंह चौहान said...

samvedansheel bhavanae.n

KAVITA RAWAT said...

पाँच प्राणियों की पेट की आग बुझाने में इतना मशग़ूल है
अपने हडिड्यों के ढ़ाँचे को देखने में भी कतराता है वो।
Aaj ki bhag-daud aur mahangaee
ke daur mein pariwar ke bharan poshan ke liye ek aam aadmi ki jaddojahat jahan wah apne tak ko bhoolkar din raat mehanat karta hai.. bakhubi prastuti kiya hai aapne aur
रातों को पलकें बंद करने से डरता हैं
क्योंकि नींद में टूटे सपने देखता है वो।
Jindagi mein kya-kya nahi sapne dekhta hai aadmi.... lekin jab jumedariya sab apne sir par aan padhti hai to phir Sunhare sapne kahan .....
Gahari bhav jagati bahut achhi prastuti....
Bahut shubhkamnayne

मीत said...

निशब्द कर दिया आपकी इस रचना ने तो...
आप मनो या न मनो पर यह है आपकी बेहतरीन रचना... दिल में एक दम उतरती चली गई...
सच में ऐसा लगता है जैसे शब्दों के प्रयोग से आइना दिखा रहे हो...
मीत
@ नैना
वाह नैना बिटिया खूब पढो.. और अपने पापा-मम्मा का नाम रोशन करो...
मीत

sidheshwer said...

बेहतरीन !

सतीश सक्सेना said...

बच्चों की मुस्कराहट पर जान छिड़कता हैं
चाँद न माँग ले ये, आँखे मिलाने से बचता हैं वो।
बहुत बढ़िया ...शुभकामनायें !!

अल्पना वर्मा said...

बच्चों की मुस्कराहट पर जान छिड़कता हैं
चाँद न माँग ले ये, आँखे मिलाने से बचता हैं वो।

दिल को छू गयी आप की यह कविता.
जीवन की सच्चाई को प्रस्तुत किया है.

अल्पना वर्मा said...

अरे वाह नैना 'के.जी' में आ गयी!
बधाई नैना और बहुत सारी शुभकामनायें और आशीष .खूब अच्छे से पढ़ाई करना.

ई-गुरु राजीव said...

का लिखा है दादा, बहुते जोरदार है. :) मजा आ गया.
यह पंक्तियाँ हमको भी अच्छी लगीं - कहता हैं वो "सुशील इस दुनिया में जी नहीं लगता
पर कमजोर बनकर दिल मरने का भी नहीं करता।

Vijay Kumar Sappatti said...

naina bitiya ... tum jaldi se school jakar khoob padhayi karo , techer ko bilkul bhi nahi satana , ghar me aakar acche padhkar , khana khakar , aur papa se ek kahani sunkar hi roz sona .. theek hai na

tumhara
vijay uncle

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