Monday, June 29, 2009

पागल

पागल

ना जाने क्यूँ चिड़चिड़ाने लगा है
बात बात पर वो बड़बड़ाने लगा हैं।

बदलतें इंसानी रिश्तों को देखकर
किताबों में वो साथी तलाशने लगा है।

लोग दो और दो को पाँच बताते हैं
बचपन के कायदे को वो खोजने लगा है।

बढ़ती जिम्मेदारियों की तपिश में
कोयलें सा काला वो होने लगा है।

जिदंग़ी की इन सीधी टेढी राहों पर
मुस्कराना भी वो भूलने लगा है।

अब अपनी ही धुन में घूमने लगा है
कहते हैं कि वो पागल होने लगा है।

31 comments:

राजीव तनेजा said...

ना जाने क्यूँ चिड़चिड़ाने लगा है
बात बात पर वो बड़बड़ाने लगा हैं।

बदलतें इंसानी रिश्तों को देखकर
किताबों में वो साथी तलाशने लगा है।

सच है...सीधे-सच्चे इनसान को आज के ज़माने में सब पागल समझते हैँ

विनोद कुमार पांडेय said...

aaj insani rishton ki paribhasha badal gayi hai...

yahan sab matlab ke liye hi hai..
isiliye bhavnaon ki kadr karane walon ko log pagal hi samjhane lage hai..

achchi kavita ...dhanywaad

MANVINDER BHIMBER said...

बदलतें इंसानी रिश्तों को देखकर
किताबों में वो साथी तलाशने लगा है।
kitna khoobsurat or bhaawpurn likha hai.......pagal koun hai....wo jo jaan kar bhi anjaan bana rhe...bahut khoob

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत सही कहा. सीधा यानि पागल.

रामराम.

Anil Pusadkar said...

सच्ची रचना।ज़माने की कड़वी सच्चाई को बड़ी सादगी से बयां किया है आपने।बहुत बहुत बधाई आपको।

प्रकाश गोविन्द said...

भाई सुशील जी
आपकी यह रचना बहुत अच्छी लगी !
सही मायने में यह आज की जिन्दगी को
परिभाषित कर रही है !

सहज और सरल तरीके से भी
कविता लिखी जा सकती है ..
यह बात इस कविता को पढ़कर
कही जा सकती है !

आपको दिल से बधाई !

आज की आवाज

अनिल कान्त : said...

जो बदला और जैसा बदला ....आज के हालातों को बयाँ किया है आपने

मीत said...

वाह!!! सुशील जी क्या कहूँ इन पंक्तियों के बारे में...
निशब्द कर दिया आपने तो आज...
सच में जो लोग इस पीडा से गुजरते हैं उन्हें सब पागल ओ कहते हैं लेकिन उनका दर्द जानने की कोई कोशिश नहीं करता...
आँखों में आंसू ले आई ये रचना...
मीत

कंचन सिंह चौहान said...

भाव अच्छे हैं कविता के....!

राज भाटिय़ा said...

अब अपनी ही धुन में घूमने लगा है
कहते हैं कि वो पागल होने लगा है।
अरे वाह... क्या बत कही आप ने.
सुशील जी बहुत सुंदर, लगता है आप ने आज हम सब की बात कह दी इस कविता मै.
धन्यवाद

ओम आर्य said...

bahut khub .............................badhiya

अमिताभ श्रीवास्तव said...

sushilji,
jindagi ki sachchi aour sidhee baat he is 'a-kavita' me. ab me kahu ki ye 'a-kavita' kyu??
tukabandi he, rachna he fir bhi
'a-kavita???'
sach to ye he ki ye jindagi he, jindagi ko dhhalne vala bahaav he aour jab bahaav bhaav ka ho to hame is jeevan ke kai pahlu dikhaai dete he,, aapki kavita me ye saari chije moujoo he/ aaj kaa insaan esi hi kisi na kisi mazaboori ko dhhote hue jivan ko KAAT rahaa he, sansaar ke rojmrya karyo ki yahi gati hoti he//
PAAGAL ho jana bhi tab sukhad ho jata he jab vyakti aapadhaapi se trast ho jaaye/ yaani is kavita me ant sukhad he// logo ki nazaro me ye baat naa aaye magar mujhe lagta he paagal hojanaa mukti hi he// kher..bahut khoobsoorat rachna he,

परमजीत बाली said...

वाह!! बहुत बढिया रचना है।बधाई स्वीकारें।
बहुत सही कहा----

बदलतें इंसानी रिश्तों को देखकर
किताबों में वो साथी तलाशने लगा है।

M VERMA said...

अब अपनी ही धुन में घूमने लगा है
कहते हैं कि वो पागल होने लगा है।
बहुत खूब

‘नज़र’ said...

सुन्दर अति सुन्दर

---
चर्चा । Discuss INDIA

रंजना [रंजू भाटिया] said...

जिदंग़ी की इन सीधी टेढी राहों पर
मुस्कराना भी वो भूलने लगा है।

सुंदरभाव लिखे हैं अच्छी लगी आपकी यह रचना सुशील जी

अविनाश वाचस्पति said...

कविता में यह लेखन प्रयोग काफी प्रभावी है। आपका इसमें हाथ आजमाना आपकी बेहतरी के सफर की ओर बढ़ने को पूरी तरह आश्‍वस्‍त करता है। जुटे रहें।

Udan Tashtari said...

बदलतें इंसानी रिश्तों को देखकर
किताबों में वो साथी तलाशने लगा है।

-बहुत बढ़िया पंक्तियाँ.

अल्पना वर्मा said...

बहुत दिनों बाद नयी प्रविष्टि आप के ब्लॉग पर आई है.

'बदलतें इंसानी रिश्तों को देखकर
किताबों में वो साथी तलाशने लगा है।'

भावभरी अच्छी रचना लिखी है.सच की तलाश में निकले व्यक्ति को पागल ही कह देते हैं अक्सर लोग!

काजल कुमार Kajal Kumar said...

बहुत सुन्दर .

डॉ .अनुराग said...

वाकई पागल है..बचपन के कायदे तो अलग होते है जी....

दिगम्बर नासवा said...

बदलतें इंसानी रिश्तों को देखकर
किताबों में वो साथी तलाशने लगा है।

लाजवाब gazal, seedhe saadhe khilte huve शेर.......

Vijay Kumar Sappatti said...

प्रिय मित्र सुशील जी

आपकी ये नज़्म , मैं कल से पढ़ रहा हूँ .. आपने पहले भी मुझे ये नज़्म के बारे में बताया था .. भाई ये तो हम सबकी ही कहानी है .. आपने इतनी सहज ढंग से आज के ज़िन्दगी को परिभाषित किया है की मैं क्या कहूँ ... मेरे पास तो शब्द नहीं है मित्र... मैं तारीफ़ भी नहीं करूँगा .. बस आपको सलाम करता हूँ की आपने मेरी , अपनी और हम जैसे सीधे सादे emotional पागलो की भावनाओं को अपने अनमोल शब्द दे दिए है ..

नमन ..

आपका मित्र

विजय

गौतम राजरिशी said...

बड़े दिनों बाद कुछ लगाया है सुशील जी आपने अपने ब्लौग पर...
सुंदर रचना !

और आपकी शिकायत वाजिब थी। अगली बार दिल्ली में अवश्य मुलाकात होगी, खुदा ने चाहा तो।

sandhyagupta said...

Saral shabdobn me behad prabhavshali rachna.

vandana said...

sushil ji
bahut hi behtreen aur saral shabdon mein aapne zindagi ko paribhashit kar diya..........har insaan ka haal bayan kar diya...........lajawaab.

Aashee's world said...

hi uncle,
i read ur comment in my blog..im imperssed by ur heartly comment.
i hv seen ur blog, i like it very much, i can't reed hindi properly but then also i reed it and umderstand our self.
thank's lot.

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

"जिदंग़ी की इन सीधी टेढी राहों पर
मुस्कराना भी वो भूलने लगा है।"
आप का ब्लाग अच्छा लगा...बहुत बहुत बधाई....
एक नई शुरुआत की है-समकालीन ग़ज़ल पत्रिका और बनारस के कवि/शायर के रूप में.जरूर देखें..आप के विचारों का इन्तज़ार रहेगा....

आकांक्षा~Akanksha said...

बढ़ती जिम्मेदारियों की तपिश में
कोयलें सा काला वो होने लगा है।

जिदंग़ी की इन सीधी टेढी राहों पर
मुस्कराना भी वो भूलने लगा है।
Kai bar jiwan ka sach kavita men se bahar nikalne ki koshish karne lagta hai...bahut sundar bhav !!

"शब्द-शिखर" पर आप भी बारिश के मौसम में भुट्टे का आनंद लें !!

विजेंद्र एस विज said...

बडी नाजुकी के साथ पेश किया आपने..एक सुन्दर कविता..

दर्पण साह "दर्शन" said...

wah acchi, bahut acchi ghazal...


khaskaar ye sher...
apna sa lagta hai:
अब अपनी ही धुन में घूमने लगा है
कहते हैं कि वो पागल होने लगा है।
duniya mujhko pagal samajhti hai aur main duniya ko...

...kaun saccha kaun jhoota?

...Badiya !!

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