Tuesday, May 5, 2009

आज का एक सच

छोटी सी तनख़्वाह में ............

वक्त की सुईयों ने
सबकी जुबान सील दी है।
बेटी अपने फटे हुए बस्तें को छिपाते हुए
रोज स्कूल जाया करती है।
बूढे पिता चंद पैसे बचाने की ख़ातिर
कड़ी धूप में इकलौता छन्ना हुआ रुमाल सिर पर रखकर
डी.टी.सी बस का इंतजार करते मिलते हैं।
माँ, हाथों की सूखी हडिड्यों पर लटकती खाल के सहारे
दिन हो या रात इस गर्मी में बिजना(पंखा) चलाती रहती है।
पत्नी पतली सी कलाईयों में
बस एक ही रंग की दो चूड़ियाँ डाले देखती है।
इनके चेहरों पर छाई उदासी
मुझे अंदर तक तकलीफ़ देती रहती है।
और मेरी आँखे, इनकी आँखो से
मिलने से कतराती फिरती है।
इस छोटी सी तनख़्वाह में
बस इनके खामोश चंद सवाल ही खरीद पाता हूँ
और जवाब के लिए दिन-भर मारा मारा फिरता हूँ।

27 comments:

अनिल कान्त : said...

ye kahani to kuchh apni si lagti hai..

halaaton ke upar aapne behtreen rachna likhi hai

रंजना [रंजू भाटिया] said...

सच में जिस तरह हालात हैं आज कल के ....आज का ही सच है ..जो भोगे वही जाने ..अच्छा लिखा आपने इस पर सुशील जी

काजल कुमार Kajal Kumar said...

बहुत सुंदर

अल्पना वर्मा said...

एक कम आमदनी वाले परिवार का आज की महंगाई की मार को झेल पाना कहाँ आसान है?
बहुत अच्छा चित्रण किया है शब्दों के माध्यम से.
सामायिक विषयवस्तु लिए अच्छी कविता.

कविता का शीर्षक कविता के सार पर सटीक बैठता है.

अल्पना वर्मा said...

ek sujhaav-
yah aap ki pasand wala blogvani tab -blog ke layout mein jaakar drag kar ke blog archive ke neechey rakhen to behtar hoga...:)

vandana said...

aaj ka katu sach kaha hai aapne.......jyadatar har ghar ke halat aise hi milenge.........bahut badhiya.

मीत said...

अब इस आज के सच पर आपने बोलती बंद करदी है... निशब्द कर दिया है...
सच में कितने ही परिवारों के यही हालात हैं... बहुत मार्मिक लिखा है आपने...
बहुत बेहतरीन रचना...
इसके लिए ढेर सारा शुक्रिया...
मीत

Harkirat Haqeer said...

माँ, हाथों की सूखी हडिड्यों पर लटकती खाल के सहारे
दिन हो या रात इस गर्मी में बिजना(पंखा) चलाती रहती है।
पत्नी पतली सी कलाईयों में
बस एक ही रंग की दो चूड़ियाँ डाले देखती है।

लाजवाब अभिव्यक्ति .....!!

इतनी गहराई से गरीबी की मार झेलते किसी परिवार का चित्रण ....क्या कहूँ...बधाई दूँ या उस परिवार के लिए दुखित होऊं......!!

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत सटीक और संवेदनशील अभिव्यक्ति.

रामराम.

डॉ .अनुराग said...

जाने क्यों जगजीत सिंह की आवाज नेपथ्य में सुनाई दी......अब मै राशन की कतारों में नजर आता हूँ...

रविकांत पाण्डेय said...

इस छोटी सी तनख़्वाह में
बस इनके खामोश चंद सवाल ही खरीद पाता हूँ
और जवाब के लिए दिन-भर मारा मारा फिरता हूँ

आह! इस कविता में आमजन की पीड़ा साफ झलकती है।

मुसाफिर जाट said...

मगर फिर भी
लाचारी होते हुए भी
बदहाली होते हुए भी
मन में एक उम्मीद रहती है
कि
एक दिन तो आएगा जब...
...
...
"हम होंगे कामयाब"

Science Bloggers Association said...

तीखा और धारदार सच।
----------
किस्म किस्म के आम
क्या लडकियां होती है लडको जैसी

अमिताभ श्रीवास्तव said...

B_E_H_T_R_E_E_N_/
sushilbhai, kyaa baat likhi he/ sach to sach he/ aour sach ka saamnaa savaal khareedne aour dinbhar maaraa maaraa firne se bhi hota he/ chhoti si tankhvaah,,,bade bade khvaab hi kyu dikhaati he????mera savaal he..///magar..jindgi chalti kaa naam gaadi he///jis tarah aapki rachna me 'kriya' pramukh he..yaani kuchh he jo chal rahaa he, jivan chal rahaa he//chhoti si tankhvaah me hi sahi/
bahut sundar rachna he/ iske liye meri aour se ek KALAM khud hi kharidkar gift maan lenaa//milne par ek shaandaar kalam byaaj sahit tohfaa baaki/
saadhuvaad/

दिगम्बर नासवा said...

vaqt की yantrnaa को sahte हुवे शब्द जैसे खुद-ba-खुद बोल रहे hon ......... आम आदमी का जीवन ऐसे ही prashnon का uttar aksar saari umr khojta rahta है

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) said...

आप का यह आज का सच बहुत अच्छा है.. हर व्यक्ति इसी सच की स्वीकारोक्ति करेगा.. आभार

sandhyagupta said...

इस छोटी सी तनख़्वाह में
बस इनके खामोश चंद सवाल ही खरीद पाता हूँ
और जवाब के लिए दिन-भर मारा मारा फिरता हूँ।

Atyant prabhavi abhivyakti.

Kapil said...

मर्मभेदी अभिव्‍यक्ति। छोटी तनख्‍वाह के दर्द को बहुत सही ढंग से उकेरा है आपने। धन्‍यवाद।

गौतम राजरिशी said...

बस इनके खामोश चंद सवाल ही खरीद पाता..जवाब के लिये मारा-मारा फिरता हूँ...

अच्छी तस्वीर किंतु दहलाती हुई

संगीता पुरी said...

घर घर की कहानी है यह .. बहुत मार्मिक पोस्‍ट .. अच्‍छा लिखा है।

BrijmohanShrivastava said...

प्रिय सुशील /अच्छा चित्रण /बूढे पिता का कड़ी धूप में वह रुमाल सर पर डाल कर जाना जो जीर्णशीर्ण (छन्ना) हो गया है ,हमारे इधर छन्ना ही शब्द प्रयोग करते हैं / माँ की सूखी हड्डियों पर लटकती खाल /अर्थाभाव में पत्नी के चेहरे पर छाई उदासी पंखा के लिए आपने बिजन शब्द प्रयोग किया है ब्रेकिट में न लिखते तो पाठकों को बड़ी दिक्कत होतीमहाराणा प्रताप पर लिखी कवितायेँ तो आपने निश्चित पढी होंगी उसमे भी बिजन शब्द अलंकार की रूप में प्रयोग किया गया था आज तो मुझे याद नहीं पर कुछ इस तरह थी "" तीन बेर खातीं ,ते वे तीन बेर खाती हैं = बिजन डुलाती ते बे बिजन डुलाती है ""एक जगह पंखा और दूसरी जगह जंगल (बीरान) अर्थ किया गया है / आपकी कविता अच्छी लगी

प्रकाश गोविन्द said...

atyant maarmik chitran kiya hai aapne apni kavita men

Jayant Chaudhary said...

Bhaai Saheb,

Aapne to nishabd kar diya.
Bahut kuchh yaad aa gayaa....

Fantastic!!

~Jayant

योगेन्द्र मौदगिल said...

हाथ के पंखे के लिये बीजणा शब्द तब सुनते थे जब छोटे थे और गर्मी की छ़ट्टियों में बूआ के गांव जाते थे. हमारी बूआ बीजणा ही बोलती थी. आपकी यह कविता पढ़ कर बूआ और गांव सब कुछ याद आ गया.

अच्छी रचना के लिये बधाई.

Vijay Kumar Sappatti said...

susheel ji ,

main kya kahun ..

aapne likha hi kuch aisa hi a ki man bhaari ho gaya aur aankhen bheeg uthi hai .. jeevan ki kadhvi sacchaiyaan ab apna roop dikha rahi hai .. main kya likhun.. bus bhaiyaa, jis din milonge aapke haath choom loonga is lekh ke liye..

aapka
vijay

rohitler said...

खूबसूरत इंतख़ाब

विजेंद्र एस विज said...

इस छोटी सी तनख़्वाह में
बस इनके खामोश चंद सवाल ही खरीद पाता हूँ
और जवाब के लिए दिन-भर मारा मारा फिरता हूँ। ....

वाह सुशील जी...बहुत उम्दा लिखते है आप....अफसोस..मैं देर से पढ पाया...

सुन्दर रचना..

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