Tuesday, March 24, 2009

इस अंधेरी रात के बाद उजली सुबह कब होगी?


रात के एक बजे, एक आदमी कार से उतर कर, पार्किंग के 10 रुपये के लिए, पार्किंग वाले से पुलिस वाला होने का रोब देखाकर तू तू मैं मैं करता हुआ बिना पैसे दिए शान से चला जाता हैं।.............. रात के डेढ़ बजे, उस जगह से चंद कदम दूर एक आदमी आमलेट दो रुपये महँगा होने की वजह से भूख का गला दबा कर चुपचाप चला गया ........... लगभग पौने दो बजे, फिर वही आदमी सिगरेट के लिए यही आता है और सिगरेट लेकर आमलेट वाले के हाथ पर सिक्के रख देता है, आमलेट वाला एक रुपये और माँगता है वह आदमी एक रुपये की जगह सिगरेट ही उसके हाथ पर रख देता है और अपनी तलब को दफनाकर अपने मरीज के पास लौट जाता है.............आज पहली बार लगा कि सिगरेट पीनी ........  ढाई बजे कुछ आदमी बहस करते हुए, धर्मो की लड़ाई में उलझे हैं। पुराने जख़्मों को कुरेद कर अपनी अपनी बातों को सही ठहरा रहे हैं और चीजों का बँटवारा करते हुए ये..... तुम्हारी, ये..... उनकी, ये..... हमारी ............ रात को काट रहे है .........  चार बजे, एक आदमी मृत भाई की लाश के पास पत्थर की मूर्ति सा खड़ा है। पैसे नही है घर ले जाने को ...... पास से गुजरता एक आदमी वजह पूछता है और फिर सारा इंतजाम कर अपनी दिल की मरीज माँ के पास चला जाता है।.......... कभी कभी रातें इतनी लम्बी क्यों हो जाती है?...................पाँच बजे एक परिवार रो रहा है पास खड़े आदमी का मोबाईल बज उठता है 'हट जा ताऊ पाछे ने' ....... दौलत से मोबाईल खरीद लिया पर उसके रखने का शिष्टाचार नही खरीद सका।..................... ( निंदा जी से माफी माँगते हुए) "आओ दोस्तों एक ऐसा भी धर्म लाया जाए जिसमें जिदंगी की लड़ाई में हाँफते इंसानो का होंसला बढ़ाया जाए।"....................

दिल हो तो धरती माँ जैसा, प्यार दे सबको एक बराबर
भले बुरे सब माँ के जाये, फूल और काँटा एक बराबर 
मिट्टी में जो बीज पनपता, धरती के लिए एक बराबर 
कोख न हिंदू, कोख न मुसलिम, जीवन बख़्शे एक बराबर।   

और हाँ कल भगत सिंह की शहादत का दिन था उनकी कुर्बानी को सलाम करते हुए उनकी याद में उन्हीं का शेर।  

हवा में रहेगी मेरे ख़्याल की बिजली, 
ये मुश्ते-ख़ाक है फानी, रहे न रहे। 
                           भगत सिंह 

नोट- यह पोस्ट अपने अनदेखे अनजाने( वैसे थोड़ा देखा, थोड़ा जाना भी है पर थोड़ा ही, पर मुलाकात नही हुई आजतक) दोस्त के लिए। ताऊ की पहेली तो रोज शनिवार को आती है पर यह छौक्कर की पहेली आज के लिए है बस, आपका बताना है वो दोस्त कौन है? सही जवाब देने वाले को ईनाम दिया जाएगा " प्यार भरा शुक्रिया" और हाँ ऊपर दी गई रचना मेरे गुरु श्री चरणदास सिंधू जी के नाटक " किस्सा पंडित कालू कुम्हार" से हैं जोकि "वाणी प्रकाशन" से छपा है।

24 comments:

अनिल कान्त : said...

क्या खूब लिखा है ....
"आओ दोस्तों एक ऐसा भी धर्म लाया जाए जिसमें जिदंगी की लड़ाई में हाँफते इंसानो का होंसला बढ़ाया जाए।" ...
सच सीधे दिल में उतरा गया

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

नीरज गोस्वामी said...

बहुत संजीदा पोस्ट...सोचने को बाध्य करती हुई....और आपके गुरु जी की पंक्तियाँ जैसे सोने में सुहागा...वाह...नमन उनकी लेखनी को...
नीरज

अविनाश वाचस्पति said...

जब पीनी हो
या उड़ाना हो धुंआ
तब नहीं देखा जाता
वेट अथवा वस्‍तु का रेट।

यह गेट तभी किया जाता है बंद
जब बेपार्क में पार्किंग होती है
पार्किंग माफिया की चांदी होती है
यह तो ऐसा सोने का सिक्‍का है
जो खूब चलता है
इसी के बल पर तो नेताओं और
पुलिस का धंधा चमकता है।

पार्क क्‍या ऐसे ही
पार्किंग में बदलता है ?

Vijay Kumar Sappatti said...

susheel bhai ,

main kya kahun .. padhkar nishabd hoon aur sochta hoon ki yadi ham sab sirf sur sirf insaaniyat ka hi paath padhte ,aur hamaare beech sirf insaaniyat ka hi bhai-chaara raha to ye duniya ek khoobsurat jagah banne me der nahi lagengi ..

ye post mujhe udaas kar gayi meri yaar .. aankhen nam ho gayi... zindagi hamen kitna kuch shikaati hai .. par hum kuch nahi seekate hai ..

aapke is mahatvpoorn aur sundar lekhan ke liye main aapko salaam karta hoon ..

aapka
vijay
[ waise wo bhaagyashaali dost kaun hai bhiyaa ]

मीत said...

सूरज की किरने दमकें सब पर, पानी भी बरसे एक बराबर...
ऐसी रचनाएँ कभी-कभी बनती हैं... यह अनमोल है...
मीत

neeshoo said...

सुशील जी मर्मस्पर्शी भाव के साथ जिस तरह का दृश्य सामने आया , मानसिक पीड़ा होती है , सच्ची अभिव्यक्ति का प्रभाव आपकी इस पोस्ट में पूरी तरह से झलक रहा है । बहुत सुन्दर

रंजना [रंजू भाटिया] said...

ममस्पर्शी लिखा है आपने .."आओ दोस्तों एक ऐसा भी धर्म लाया जाए जिसमें जिदंगी की लड़ाई में हाँफते इंसानो का होंसला बढ़ाया जाए।"....................सच में इस तरह के भावों की जरुरत है ...

ताऊ रामपुरिया said...

हवा में रहेगी मेरे ख़्याल की बिजली,
ये मुश्ते-ख़ाक है फानी, रहे न रहे।

बहुत ही मर्मस्पर्सी और सशक्त. बहुत शुभकामनाएं.

रामराम.

Mired Mirage said...

पहेली बूझना तो आता ही नहीं। लेख बहुत मर्मस्पर्शी है।
घुघूती बासूती

Science Bloggers Association said...

जिंदगी के सत्‍य को जस का तस परोस दिया है।

अल्पना वर्मा said...

शहीद भगत सिंह की शहादत को हमारा भी सलाम!

'दौलत से मोबाईल खरीद लिया पर उसके रखने का शिष्टाचार नही खरीद सका।'आप ने कहा और साथ ही माफ़ी भी मांग ली!
बहुत विनम्र हैं आप सुशील जी!'

मिट्टी में जो बीज पनपता, धरती के लिए एक बराबर
कोख न हिंदू, कोख न मुसलिम, जीवन बख़्शे एक बराबर।

''एक ऐसा भी धर्म लाया जाए जिसमें जिदंगी की लड़ाई में हाँफते इंसानो का होंसला बढ़ाया जाए।''--बेहद अच्छा विचार है.बहुत खूब!

आप की इस रचना के प्रकाशन पर आप को बधाईयाँ और शुभकामनायें.
और यह पहेली तो बूझना अपने बस की नहीं की आप का वह अनजाना दोस्त कौन है??यह तो आप ही बताएँगे!!!!!!!

बहुत अच्छा लेख है सुशील जी.
पुनः बधाई.

दिगम्बर नासवा said...

सोचने को मजबूर करता है आपका लेख..........
भगत सिंहग की शहादत को सलाम ...

Harkirat Haqeer said...

मैं भी सोचू इस बार आने में इतनी देर क्यों कर दी......?? आप तो इधर पहेलियों मे व्यस्त थे
...khair आपकी पोस्ट दो- तीन बार पढ़ी...टिप्पणियाँ भी पढ़ी कहीं कोई क्लू नही मिला...अब यहाँ रामप्यरी भी नही है...कुछ आप्सन भी नहीं.....चलिए अंदाज़ से पाँसा फेक देते हैं...."डाक्टर अनुराग"..
लाक कर दिया जाए...!!

Harkirat Haqeer said...

हाँ एक बात गौर की... आपका दोस्त बनने के लिए काफ़ी लोग ललाइत हैं...बड़े भाग्यशाली
हैं आप......!!

रविकांत पाण्डेय said...

दोस्त को तो नहीं पहचान पाए पर वाकया जबरदस्त है। एक सांस में पढ़ने लायक।

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर लेख ... काफी कुछ सोंचने को मजबूर करती।

राज भाटिय़ा said...

सुशील जी, वो दोस्त है हमारी अपनी आत्मा, हमारे मै सोया हुआ इन्सान,
बाकी आप की रचना बहुत ही भाव पुर्ण लगी.आप ने इस छोटे से लेख मै बहुत बडी बात कह दी
धन्यवाद

Harkirat Haqeer said...

साह रह गये बेलिया थोडे,चंगा तू कोई कम्म कर लै
इक्क दिन मिट्टी दी मुटठ होणा, भला तू कोई कम्म कर लै।...waah..waah...!!

डॉ .अनुराग said...

शुक्रिया दोस्त......कल दिन भर उलझा रहा रोमार्रा की कवायदों में किसी ब्लॉग को नहीं पढ़ पाया .अपनी पोस्ट भी जल्दबाजी में पोस्ट की ओर निकल गया .शायद कल के दिन मुझे ये छूट हासिल थी ....तुम्हारी चोकलेट उधार है मुझ पर

कंचन सिंह चौहान said...

kuchh raate.n vaquai bahut lambi ho aati hai.n kabhi kabhi...! ek hi raat me kya kya ghatata dikha aap ki post me.....!

aur rahi baat us dost ki jab Harqirat Ji ne kah diya aur Anurag Ji ne thanks bhi de diya ro mai kya bolu.n...varna to mai apna hi naam fit kar leti ji.... ! :) :)

aap ke dost khushkismat hai..!

योगेन्द्र मौदगिल said...

इस बार तो हतप्रभ कर दिया आपने छोक्कर जी...

अमिताभ श्रीवास्तव said...

yes bhai,
aaj hi aaya aor sabse pahle blog par apne aagman ki soochna di,un logo ko eksaath khabar di jinhone mere gaav jaane ke baad post par apni tippani di thi,kher..
pitaji ka svasth jyada kharab ho gaya tha, kintu ab thik he,,ishvar aour aap jese mitro ki duaye saath thi hi...
sushilji, aapke poochhne me pahli baar mujhe aapke apne hraday ke kareeb hone ka ahsaas mila..
''aaye aour bataya bhi nahi...''
subah aaya tha, thakaan thi,net par betha tha ki aapko Email karu, kintu hamari society ka men power line me kuchh kharabi ki vajah se light chali gai aour jyada kuchh nahi likh saka..yadi aap mujhe apna mob no. de dete to sambhav tha ham aapas me batiyate rahte..kher..me to mera mob no. aapko de hi chuka hu,, kintu vo shayad sirf mail ki shobha me darz he..
aapne vakai ek behtreen rachna ka beez boya he..dono nai rachnaye padh li..iske baare me aapko apni raay jaroor likhunga..par abhi to dosti yaari ki baate ho to achcha he..
thodi thakaan he, utar jaayegi to blog par kuch parosunga..

राजीव तनेजा said...

दोस्त का तो पता नहीं लेकिन लेख मार्मिक है...

vandana said...

sushil ji
bahut hi marmsparshi lekh likha hai
...........na jaane is raat ki subah kab hogi ya hogi bhi ya nhi kyunki dil to patthar ke hain sabke.
chaht to yahi hoti hai ki ek aisa dharm ho jahan sabke dard ek ho .
itna hi kehna chahungi ki wo dost hum khud hain apne agar banna chahein to aur kisi girte huye ko thamein to.

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