Monday, October 20, 2008

एक लड़की की कहानी

एक लड़की एक पहेली

वह लड़की एक पहेली थी
कहने को तो इसकी ढ़ेरों सहेली थी
फिर भी यह अकेली थी।

मुस्कराती थी, खिलखिलाती थी, देर तक बतियाती थी
पर ना जाने अकेले में किस सोच में डूब जाती थी।

कभी-कभी वह बच्चों सी बातें करती थी
और कभी वो फ्रायड को भी मात दे जाती थी।

जब कोई बात ना होती थी
तब वह अपने कोमल हाथों से सपने बुनने लगती थी
कभी आसमान को छूने के सपने
कभी सुन्दर, प्यारे घर के सपने
परंतु अपनो के सपने पूरे करने में वह अपने सपने भूल जाती थी।

आज मिली वही रस्तें में बोली "कैसे हो तुम"
मैं पहचान ना सका, बस एकटक देखता रहा
उसके खुरदरे हाथों को
उसकी आँखो के नीचे के काले घेरों को
उसकी हडिडयों की काया को
उसकी आँखों में आये एक आँशू को
मैं बोला "तुम वही हो ना जिसका नाम मैंने "पहेली" रख दिया था"
वो बोली "हाँ वही पहेली, जिदंगी की पहेली सुलझाते सुलझाते सच में ही एक पहेली बन कर रह गई
यह बात कहते ही वह जार जार रो पड़ी, जो कभी बात बात पर हँसती थी।

12 comments:

रंजना [रंजू भाटिया] said...

जिदंगी की पहेली सुलझाते सुलझाते सच में ही एक पहेली बन कर रह गई..

क्या कहूँ .लाजवाब कर दिया इस कविता ने ..बेहद भावपूर्ण दिल को करीब से छु लेने वाली कविता है यह ..कब ज़िन्दगी ही पहेली बन जाए यह कौन जाने ..बहुत बहुत सुंदर ...

श्रीकांत पाराशर said...

sach men, ek bahut achhi kavita. bhavnaon se otprot.

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

वाकई में ज़िंदगी की पहेलिया ऐसी ही होती है.. एक भावपूर्ण रचना..

रंजना said...

अत्यन्त भावपूर्ण और मार्मिक,पर सत्य का दिग्दर्शन कराती पंक्तियाँ.

जितेन्द़ भगत said...

बेहतरीन कवि‍ता-
आसमान को छूने के सपने
कभी सुन्दर, प्यारे घर के सपने
परंतु अपनो के सपने पूरे करने में वह अपने सपने भूल जाती थी।

कायल हो गया मैं आपकी कवि‍ता पर। बहुत सुंदर।

डॉ .अनुराग said...

बहुत कुछ कह दिया आपने इस कविता के बहाने.....इसका उजला पक्ष भी ओर अंधेरे वाला भी.......बस इतना ही कहूँगा .....
"वो मिला तो याद आया
वो इक ख्वाब पुराना था "

अविनाश वाचस्पति said...

भावों के कुशल चितेरे

सुशील कुमार छौक्‍कर हैं

शब्‍दों में धीरे धीरे पैठ

जमाने लगे हैं

नहीं इनको जमाने लगे हैं।

भुवनेश शर्मा said...

ऐसी लड़कियां जमाने में अक्‍सर मिल जाया करती हैं

बेहतरीन कविता

राजीव तनेजा said...

क्या बात मियाँ?...

मुझ पर 'सआदत हसन मंटो जी' का असर बताने वाले खुद उनकी शैली में कविताई करने लगे हैँ।...

बहुत बढिया....
बेहतरीन...ताज़ातरीन...और अंत में गमगीन करती हुई कविता के लिए बधाई

ताऊ रामपुरिया said...

परिवार व इष्ट मित्रो सहित आपको दीपावली की बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएं !
पिछले समय जाने अनजाने आपको कोई कष्ट पहुंचाया हो तो उसके लिए क्षमा प्रार्थी हूँ !

वर्षा said...

अच्छा हो ऐसी पहेलियां सुलझ जाएं।

vandana said...

is kavita ko padhkar mere rongte khade ho gaye..........sach aisi aboojh paheli hai jise jitna boojhne jao utni hi uljhati hai

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