Sunday, June 1, 2008

गुर्जर आंदोलन

गुर्जर आंदोलन- वादा वादा वादा ...................


बचपन से सुनता आया हूँ कि आग लगी हो तो पानी डालना चाहिए ना कि तेल। पर राजस्थान सरकार तो पिछले एक डेढ साल से बस तेल ही तेल डाल रही है पानी नही। उनका ताज़ा बयान आया है कि इन शवों के वारिस आ जाए नही तो इन शवों को ला-वारिस समझ कर इनका दाह संस्कार कर दिया जाएगा। इससे पहले बोला गया कि हम कमांडो कारवाई भी कर सकते है। और इससे पहले कहा गया कि इन्होंने हमारे एक पुलिस वाले को मार दिया तो हमने अपनी आत्मरक्षा मे गोली चला दी। आपकी आत्मरक्षा 40 बेकसूर लोगो की जान ले गई। कहते भारत देश में लोकतंत्र है फिर भी ऐसा हो गया । ये सब तो अग्रेंजो के वक्त या फिर राजशाही के वक्त होता था । वैसे वसुंधरा राजे जी भी तो सिंधिया राज घराने से है। अपने विरुद्ध प्रर्दशन कैसे देख सकती है। इन्ही वसुंधरा जी 2003 के चुनाव मे गुर्जरो से ये वादा किया था कि सता मे आने पर गुर्जरो को अनूसुचित जनजाति मे शामिल करेंगे। पर सता मे आने के बाद वे वादे से मुकर गई और सता का सुख भोगने लगी । यहाँ यह सवाल उठता है कि चुनाव मे क्या वो वादे करने चाहिए जिनको आप पूरा नही कर सकते । झूठा वादा करके आप सता प्राप्त करे क्या यही सच्चा लोकतंत्र है। वैसे इस बारे मे अवश्य सोचना चाहिए । राजस्थान में करीब 5% गुर्जर समुदाय है जो लगभग 60 लाख की जनसख्या होगी। राजस्थान की 200 सीटों में से 43 सीटें गुर्जर बहुल है पर अधिकतर सीटें आरक्षित है जहाँ वे अपना नेता भी खड़ा नही कर सकते हैं इस 60 लाख गुर्जरो मे एक भी IAS,IPS,IFS नही है। और इनसे छोटे पदों पर भी आपको ये लोग नही मिलेंगे। इनका मुख्य व्यवसाय पशु पालन और खेती करना है। इनकी आर्थिक हालात भी ठीक नही है। इस समुदाय में शिक्षा भी नाम मात्र की है। दिल्ली जैसे शहर के गुर्जर परिवारों में भी आपको ज्यादा पढे लिखे नही मिलेगे। जहाँ आज भी उनका व्यवसाय पशु पालना और दूध बेचना है।( वैसे दिल्ली में अपवाद के लिए कुछ गुर्जर परिवार पैसे से सम्पन्न है क्योंकि उनकी ज़मीन का अधिग्रहण कर उनको मुआवजा दिया गया। पर आज भी वे पशु पाल कर दूध बेचते है और उन परिवारों में आज भी अधिकतर कम पढे लिखे और अनपढ मिल जाऐगे) इसी से आप अंदाजा लगा सकते है कि राजस्थान मे क्या हाल होगा गुर्जरो का। परंतु वहाँ की BJP सरकार 14% मीणा को नाराज नही करना चाहती है। जिनकी सरकार में ज्यादा भागीदारी है। परंतु गुर्जरो की जायज माँगो के बारे में सरकार को ठंडे दिमाग से सोचना चाहिए।



आंदोलन की शुरूवात से अब तक का सफर


1950 में अनुसूचित जनजाति में शामिल होने के लिए आंदोलन शुरू किया। परंतु 1981 मे पिछड़ा वर्ग में रखा गया। फिर 1993 मे अन्य पिछड़ा वर्ग मे रखा गया। सन 2000 में इस आंदोलन की फिर से शुरूवात हुई। सन 2003 मे वर्तमान मुख्यमंत्री ने वादा किया कि अगर वो सता मे आई तो गुर्जरो को अनुसूचित जाति मे शामिल करेगी। और वोटो के लिए गुर्जरो की समधिन होने का वास्ता दिया था। परंतु सता मे आने के बाद वही हुआ जो अक्सर होता वादा भूल जाना। सन 2005 तक वादा वादा ही रहा। 2006 मे आंदोलन फिर शुरू हुआ रास्ते रोके गये। फिर मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया। गुर्जर जनता इस आश्वासन के भरोसे जिंदगी चलाती रही। फिर मई 2007 मे रोड रोको ,रेल रोको आंदोलन शुरू हुआ जहाँ 29 मई को पुलिस की गोली का 26 जिंदगी शिकार बनी। फिर वार्ता हुई मुख्यमंत्री ने आयोग बना कर गुर्जरो को बहकाया। 23 मई 2008 को यह आंदोलन फिर शुरु हुआ। जहाँ 40 से 50 जिंदगीयाँ फिर से पुलिस की गोलियों का शिकार बनी। और आंदोलन आज भी जारी है।


पिछड़ा वर्ग से अनूसुचित जनजाति मे शामिल होने के पड़ाव


जब कोई समुदाय अनुसूचित जनजाति मे शामिल होने की माँग करता है तो वहाँ की सरकार जांच- पड़ताल करती है कि वह अनुसूचित जनजाति मे शामिल होने की शर्तों को पूरा करता है या नहीं । वैसे तो अनुसूचित जनजाति मे शामिल करने के लिए कोई स्थायी बिंदु तय नही है फिर भी मोटे तौर पर लोकुर कमेटी ने कुछ एक बिंदु तय किय थे । 1. अलग पहचान वाली सस्क्रंति 2. भारी पिछडापन 3. अन्य जाति से सम्पर्क में हिचकिचाहट 4. अलग देवी -देवता हो 5. भौगोलिक रुप से अलग थलग हो । (गुर्जर इन बिंदुओ पर खरे उतरते है। वैसे लोकर कमेटी और इतिहास कार कर्नल टार्ड ने भी गुर्जरो को अनुसूचित जनजाति माना है ) इस के बाद राज्य सरकार संतुष्ट होने पर एक सिफारिश पत्र केन्द्र को भेजता है। फिर केन्द्र अनुसूचित जाति- जनजाति आयोग को भेजता है जहाँ इसकी जाँच- पड़ताल होती है। फिर सारा मसौदा केन्द्रीय मंत्रिमंडल को भेजा जाता है। जहाँ विचार विमर्श के बाद संसद मे पेश किया जाता है। संसद में पारित होने के बाद एक अधिसूचना जारी की जाती है।


गुर्जर और उनका इतिहास


गुर्जर इतिहास के बारे में इतिहास-कारों की अलग अलग राय है। कुछ इतिहास-कार इन्हें हूणों से जोड़ते है और कुछ इन्हें आर्यों से जोड़ते है। 7 से 12 सदी तक हूणों का बोलबाला रहा था। 12 वी सदी के बाद इनकी शक्ति का पतन शुरू हुआ। और इनके कई टुकड़े हो गए। कुछ हिस्से राजपूतो से मिल गये और कुछ हिस्से कबीलों मे बदल गये। ये लोग पहाडो और जंगलो में रहते आऐ है। इन लोगो ने अग्रेंजो से भी लोहा लिया जिसके कारण इन्हे अग्रेजों ने 1857 में अपराधिक जनजाति के रुप में चिंहित किया।ये इसी कारण पिछडॆ बने रहे। आजादी के बाद भी ये पिछड़ते चले गये। गुर्जर जाति हिंदू और मुस्लिम दोनो में ही पाई जाती है। ये भारत में जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, उतर प्रदेश, दिल्ली , मध्य प्रदेश, आदि मे बसे हुए है। जहाँ इनका मुख्य व्यसाय पशु पालन, खेती, दुग्ध उत्पादन है।

6 comments:

Suresh Gupta said...

आप जो कह रहे हैं उस पर मैं बहस नहीं करूंगा. क्योंकि आप को इस बारे में काफ़ी जानकारी है. मैं सिर्फ़ इतना कहूंगा कि जो लोग मरे हैं उनके लिए आंदोलनकारी और सरकार दोनों जिम्मेदार हैं. सरकारी संपत्ति को नष्ट करना, आवागमन को अवरुद्ध करना और आतंक का वातावरण पैदा कर देना उचित नहीं कहा जा सकता. आंदोलनकारी और सरकार दोनों ने हाई कोर्ट के आदेशों की अवमानना की है. यह एक अपराध है.

गुर्जरों को राजस्थान सरकार से शिकायत हो सकती हैं, पर शिकायत जाहिर करने का यह तरीका ग़लत है. बीजेपी के वायदे पर गुर्जरों ने उसे वोट दिया. यह वायदा पूरा न किए जाने पर दुःख और गुस्सा होना स्वाभाविक है. पर हिंसक आन्दोलन उस का समाधान नहीं है. अपनी बात कहिये पर शान्ति से. फ़िर भी अगर बात नहीं मानी जाती तब कानून का सहारा लीजिये. उस से भी बात न बने तो आने वाले चुनाव में बीजेपी को हरा दीजिये. प्रजातंत्र में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है. अगर कोई हिंसा करता है तो उस से सभी को नुकसान होगा.

रंजन said...

हक माँगोगे तो वादा देंगे ...प्रर्दशन करोगे तो गोली से भुन देंगे।

आप आधी बात कर रहे है साहब... प्रर्दशन करो.. कौन रोकता है.. देश मे रोज प्रर्दशन होते है.. लेकिन ट्रेन रोक दो.. रास्ते बन्द करो.. अपनी सुविधा (आरक्षण) की मांग के लिये.. बाकी सभी का जीवन नरक कर दो.. अपने हक (जैसा आप कह रहे है) के लिये दुसरो के मौलिक अधिकार छिन लो.. ये कहां का इंसाफ है..? अगर गुर्जरो मे हिम्मत है.. तो शान्ति से जयपुर मे विधानसभा के सामने.. CM House के सामने अनिश्चित काल का धरना दिया होता... अहिसां के लिये साहस चहिये.. अपने गली से जा रही रेल का रास्ता रोकना कायरता है..

सुशील कुमार said...

सुरेश जी, रंजन जी,
आपने दोनो ने अपनी राय रखी उसके लिए आपका धन्यवाद। वैसे मैं भी हिंसा का समर्थक नही हूँ पर मैने अपनी आँखो से नर्मदा आंदोलन, भोपाल गैस त्रासदी आंदोलन को देखा है बल्कि नर्मदा आंदोलन मे मैं बहुत बार शामिल भी रहा हूँ । ये दोनो आंदोलन शांति प्रिय ही रहे है। उनका क्या रहा ये आपको भी पता होगा।

दिनेशराय द्विवेदी said...

गुर्जर नेताओं को दोष देने से क्या होगा? उन्हें इस हालत तक पहुँचाने वाली व्यवस्था ही सबरुप दोषी है।

AAKANCHA I LOVE YOU said...
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vikram singh khatana said...
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