Monday, February 25, 2008

हवा
ना जाने कैसी अजब हवा चली है
आदमी- आदमी में दूरी बढी है
ना जाने कैसी अजब हवा चली है
"मैं- मैं" की गर्जन में "हम" की आवाज कहीं दब चली है
ना जाने कैसी अजब हवा चली है
मुखोटों के इस घने बादलों में इंसान की सूरत कहीं छिप चली हैं
ना जाने कैसी अजब हवा चली है
पैसो की बारिश की तमन्ना में ईमानदारी की मिट्टी कहीं बह चली हैं
ना जाने कैसी अजब हवा चली है
माँ - बाप की ख्वाहिशों की आंधी में बच्चों की इच्छाएँ उड़ चली हैं
ना जाने कैसी अजब हवा चली है
फैशन की इस पश्चिम हवा में कपड़ो की लम्बाई घट चली हैं
ना जाने कैसी अजब हवा चली है
उद्योगपतियो की बाढ़ में किसानों की जमीन कट चली है
ना जाने कैसी अजब हवा चली है
बिचोलियो की बहार में किसान की जीनस सूख चली है
ना जाने कैसी अजब हवा चली है
शहरों की इस चमकती बिजली में गाँवों की मिटटी राख हुई चली है
ना जाने कैसी अजब हवा चली है

1 comment:

rajivtaneja said...

अच्छा व्यंग्य....कविता के रूप में....लगे रहो....

एक राय आपके लिए कि कमैंट पोस्ट करने के लिए वर्ड वैरीफिकेशन को सैटिंग में जा कर हटा लें

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